भूजल में ज़हर, हवा में बीमारी: अमरोहा में रासायनिक कारखानों पर किसानों का बेमियादी आंदोलन

रासायनिक कारखानों पर गंभीर आरोप, भूजल प्रदूषण से गर्भस्थ शिशुओं तक खतरे की चेतावनी
विश्लेषणात्मक, विशेष रिपोर्ट। Target Tv Live
गजरौला (अमरोहा), 16 जनवरी।
अमरोहा जनपद के गजरौला क्षेत्र स्थित नाईपुरा गांव में भूजल प्रदूषण का मुद्दा अब केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, पर्यावरण और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़ा बड़ा सवाल बनता जा रहा है। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले रासायनिक कारखानों से फैल रहे प्रदूषण के खिलाफ बेमियादी धरना शुक्रवार को 27वें दिन भी जारी रहा।
धरना स्थल पर शुक्रवार को मंडी धनौरा के नायब तहसीलदार योगेश कुमार आज़ राजस्वकर्मियों के साथ पहुंचे। वहीं उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी के नेतृत्व में चिकित्सकों की टीम ने शहबाजपुर डोर पहुंचकर जनस्वास्थ्य की स्थिति का जायजा लिया। प्रशासनिक उपस्थिति के बावजूद किसानों का कहना है कि मैदानी कार्रवाई और निर्णायक कदम अब भी नदारद हैं।
भूजल में ज़हर, हवा में बीमारी—भविष्य पर मंडराता संकट
किसान संगठनों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में स्थापित रासायनिक कारखाने भूजल को इस हद तक दूषित कर चुके हैं कि ग्रामीणों का जीवन, स्वास्थ्य और आजीविका तीनों संकट में हैं। उनका दावा है कि कारखानेदार राजनीतिक दलों को दान देकर संरक्षण प्राप्त करते हैं, जिससे कार्रवाई टलती रहती है।
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. गौतम लंबरदार के निष्कर्षों ने चिंता और गहरा दी है। उनके अनुसार:
- पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कण प्लेसेंटा तक पहुंचकर गर्भस्थ भ्रूण को नुकसान पहुंचा रहे हैं,
- नवजात शिशुओं के वजन में कमी,
- अंगों के विकास में बाधा,
- और भविष्य में गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नाईपुरा क्षेत्र में प्रदूषण स्तर लगातार सुरक्षित मानकों से ऊपर बना रहता है, जिससे भावी पीढ़ी सबसे अधिक जोखिम में है।
बीमारियों का बढ़ता ग्राफ, बेरोज़गारी भी चरम पर
प्रदूषित पानी और हवा के चलते क्षेत्र में श्वसन रोग, हृदय रोग, एलर्जी, अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है। किसानों ने यह भी बताया कि
- दिसंबर में बेरोज़गारी दर करीब 4.8% रही,
- जबकि गजरौला के कारखाने रोजगार देने के बजाय स्वास्थ्य और पर्यावरण को तबाह कर रहे हैं।
ग्रामीण इलाकों में भूजल ही मुख्य जल स्रोत है, लेकिन 90% सतही जल पहले ही प्रदूषित हो चुका है। सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए किसानों ने कहा कि देश में 78% ग्रामीण और 59% शहरी घरों तक आज भी स्वच्छ जल नहीं पहुंच पा रहा।
एमपीलैड्स फंड और पारदर्शिता पर सवाल
यह आंदोलन अब सांसदों की एमपीलैड्स फंड जवाबदेही से भी जुड़ गया है। किसानों का आरोप है कि:
- न तो परियोजनाओं की स्पष्ट सूची सामने है,
- न ही उनकी प्रगति दिखाई देती है।
हाल में ट्रांसपेरेंसी पोर्टल बंद होने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। किसान संगठनों को आशंका है कि इससे जनता के सवालों को दबाने की कोशिश की जा रही है।
‘जमीन के ऊपर की सफाई, जमीन के नीचे की सुरक्षा’—किसानों की दो टूक
किसान नेताओं ने इंदौर जैसी घटनाओं की याद दिलाते हुए चेताया कि दूषित पानी जानलेवा साबित हो सकता है। उनका साफ कहना है—
“जब तक जमीन के ऊपर की स्वच्छता, जमीन के नीचे के जल स्रोतों की सुरक्षा से नहीं जुड़ेगी, तब तक विकास अधूरा और खोखला रहेगा।”
धरने में ये प्रमुख चेहरे रहे मौजूद
इस अवसर पर भाकियू संयुक्त मोर्चा के
राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी, प्रमुख राष्ट्रीय सचिव अरुण सिद्धू, प्रदेशाध्यक्ष राम कृष्णा चौहान, अमरजीत देओल, अहसान अली, शाने आलम, अभिषेक भुल्लर, समीर चौधरी, आज़म चौधरी, आसिफ चौधरी, इरशाद गुजर, हैदर चौधरी, राम सरण सिंह, ओम प्रकाश, रामप्रसाद, डालू सिंह, श्याम सिंह, रामचंद्र सिंह, मोहम्मद अली, ध्यान सिंह, विजय सिंह, नियामत चौधरी, विरासत वसीयत, होमपाल सिंह, रघुवीर सिंह सहित बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।
निष्कर्ष
नाईपुरा का यह आंदोलन अब केवल एक गांव की लड़ाई नहीं रहा। यह स्वच्छ जल, स्वस्थ भविष्य और जवाबदेह विकास मॉडल की मांग बन चुका है। सवाल यह है—क्या प्रशासन और सरकार समय रहते निर्णायक कदम उठाएंगे, या ज़हर बनता पानी आने वाली पीढ़ियों की किस्मत तय करता रहेगा?
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