जहरीले पानी के खिलाफ़ ‘लोहड़ी की आग’: ठंड, ज़हर और सत्ता की चुप्पी के बीच 23 दिन से डटे अमरोहा के किसान

रिपोर्ट अवनीश त्यागी
गजरौला (अमरोहा), 13 जनवरी।
जब देश नए साल और लोहड़ी के उल्लास में डूबा था, तब अमरोहा जिले के शहबाजपुर डोर और नाईपुरा गांव के किसान खुले आसमान के नीचे, बर्फीली हवाओं के बीच कैमिकल युक्त दूषित पानी के खिलाफ़ संघर्ष की आग जलाए बैठे थे। यह धरना सिर्फ मौसम से जूझने का नाम नहीं, बल्कि फसलों, नस्लों और आने वाली पीढ़ियों को बचाने की आखिरी जिद बन चुका है।
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी के नेतृत्व में चल रहा यह बेमियादी धरना अब 23वें दिन में प्रवेश कर चुका है। लोहड़ी के दिन भी किसान अलाव के चारों ओर जुटे—उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि उम्मीद को ज़िंदा रखने के लिए।
धरने की असली वजह: ज़हर बन चुका पानी
जिला पंचायत सदस्य धर्मपाल सिंह खड़गवंशी ने साफ शब्दों में कहा कि यह कोई सामान्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि वर्षों से दबे उस असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो गांव, गरीब और किसान की लगातार होती उपेक्षा से जन्मा है।
उन्होंने चेताया—
“ऐसी स्थिति में आप और हम सभी इससे अछूते नहीं हैं।”
❗ गंभीर आरोप और ज़मीनी हकीकत
- खेतों के ट्यूबवेल और घरों के नलों तक कैमिकल युक्त बदबूदार पानी पहुंच चुका है
- फसलें बर्बाद, उत्पादन घटा
- प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) पर असर, नस्लें प्रभावित
- जलजनित बीमारियाँ गांव-गांव फैल रहीं
- बच्चों और महिलाओं पर सबसे ज्यादा मार
लोहड़ी: उत्सव नहीं, प्रतिरोध का प्रतीक
लोहड़ी को सर्दी की विदाई और बसंत के स्वागत का पर्व माना जाता है। लेकिन नाईपुरा और शहबाजपुर डोर में यह पर्व जीवन बचाने की प्रतीकात्मक लड़ाई बन गया।
मार्मिक दृश्य
- ठंड से काँपते हाथों से जलता अलाव
- आँखों में आँसू, होंठों पर मुस्कान
- बीमार बच्चे को गोद में लिए माँ, फिर भी रेवड़ी बांटती हुई
- बूढ़ा किसान, धरने से उठकर आग में हाथ सेंकता, ताकि ज़िंदगी का रंग बाकी रहे
“सुंदर मुंडड़े…” की धुन कांपती आवाज़ों में गूंज रही थी—
यह गीत नहीं था, यह हार न मानने की घोषणा थी।
सत्ता की संवेदनहीनता पर सवाल
इंदौर की दूषित जल त्रासदी के बाद यह मुद्दा लखनऊ से लेकर दिल्ली तक चेतावनी बनकर उभरा है। इसके बावजूद, राज्य सरकार के प्रभारी मंत्री केपी मलिक की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब नपुंसकता और फर्टिलिटी जैसे गंभीर सवालों पर ठहाके और हल्के हाव-भाव देखने को मिले, तो किसानों के जख्म और गहरे हो गए।
किसानों का सवाल सीधा है—
“जब हमारी नस्लें खतरे में हैं, तब यह मज़ाक कैसा?”
संघर्ष और संस्कृति साथ-साथ
एक ओर दूषित पानी के खिलाफ लंबा संघर्ष, दूसरी ओर जीवन की लय और परंपराओं को थामे रखने की जद्दोजहद—अमरोहा के गांव आज इसी दोराहे पर खड़े हैं।
लोहड़ी की आग के साथ हर किसान के दिल में एक सवाल धधक रहा है—
- कितनी लोहड़ियाँ और जलेंगी?
- कितने बच्चे बीमार पड़ेंगे?
- कितनी माँएँ और रोएँगी?
फिर भी संदेश साफ है—
“हमारी फसलें मर सकती हैं, हमारा पानी ज़हर हो सकता है,
लेकिन हमारी उम्मीद, हमारी संस्कृति और हमारी आवाज़ अभी नहीं मरेगी।”
इनकी रही प्रमुख मौजूदगी
- जिला पंचायत सदस्य धर्मपाल सिंह खड़गवंशी
- सरदार मनदीप रंधावा, सरदार गुरविंदर सिंह
- कृष्णा जी, नूरजहां, कलसूम, सकीना
- चंद्रपाल सिंह, रिंकू सागर, अमरजीत देओल
- योगेश चौधरी, चरण सिंह, एहसान अली
- शाने आलम, नूर चौधरी, शराफत अली
- तालिब चौधरी, इरशाद चौधरी, आसिफ चौधरी
- मंसूर अली, असद अली, रामप्रसाद, आहद अली सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण
निष्कर्ष
यह अमरोहा की लोहड़ी नहीं—
यह भारत के अन्नदाता के दिल की चीख है,
जो आग बनकर जल रही है।
अब सवाल सिर्फ इतना है—
क्या कोई सुन रहा है?
क्या इस आग को बुझने से पहले कोई बचाएगा?
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