धरती आबा से लेकर योगी सरकार के ‘जनजाति भागीदारी उत्सव’ तक: आदिवासी अस्मिता का नया अध्याय शुरू!

“अपना देश और अपना राज्य” — बिरसा मुंडा की पुकार पर गूँजा लखनऊ

13 नवंबर 2025, लखनऊ — मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान, गोमती नगर में धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर आयोजित भव्य समारोह में ‘जनजाति भागीदारी उत्सव’ का शुभारंभ किया।
इस अवसर पर उन्होंने कहा—
“पहले जब सरकारी नौकरी के विज्ञापन निकलते थे, तो अनुसूचित जाति और जनजाति की सीटें खाली रह जाती थीं, लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं।”
मुख्यमंत्री ने बिरसा मुंडा के अदम्य साहस को नमन करते हुए कहा कि उन्होंने स्वतंत्र भारत की नींव के लिए अपने जीवन की आहुति दी — “धरती आबा केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार हैं — आत्मसम्मान, स्वराज और स्वाभिमान का प्रतीक।”
कार्यक्रम की झलकियाँ:

- जनजातीय नृत्य और संगीत की धुनों ने पूरा हॉल झंकृत कर दिया।
- ‘धरती आबा गैलरी’ में बिरसा मुंडा के जीवन संघर्ष की झलकियाँ प्रदर्शित की गईं।
- हस्तशिल्प प्रदर्शनी में जनजातीय कारीगरों ने अपनी संस्कृति को वस्त्रों, मूर्तियों और लोककला के रूप में सजाया।
- जनजातीय युवाओं के लिए करियर काउंसलिंग कैंप और सरकारी योजनाओं की जानकारी बूथ भी लगाए गए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का वक्तव्य: “अब बदली है तस्वीर”
मुख्यमंत्री ने कहा कि आज जनजातीय समाज को वह सम्मान मिल रहा है जिसके वे सदियों से हकदार थे।
“आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आदिवासी समाज देश की विकास यात्रा का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। हम गर्व से कह सकते हैं — अब कोई भी बिरसा मुंडा की धरती को अनदेखा नहीं कर सकता।”
उन्होंने आगे कहा कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सुरक्षा के क्षेत्र में राज्य सरकार जनजातीय समाज के लिए विशेष योजनाएँ चला रही है — “अब कोई भी भर्ती ऐसी नहीं, जिसमें जनजातीय युवाओं की भागीदारी न हो।”
🔸 भगवान बिरसा मुंडा — स्वराज और अस्मिता के प्रतीक
- जन्म: 15 नवंबर 1875, उलिहातू (झारखंड)
- आंदोलन: उलगुलान — ब्रिटिश हुकूमत और जमींदारी प्रथा के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष
- नारा: “अपना देश, अपना राज्य”
- निधन: 9 जून 1900 (केवल 25 वर्ष की आयु में)
उनका सपना था — आदिवासियों के लिए आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी भारत।
इसी विचार को आज “जनजाति भागीदारी उत्सव” के रूप में जीवित किया जा रहा है।
‘जनजाति भागीदारी उत्सव’: 13 से 18 नवंबर तक विशेष आयोजन

- अवधि: 13 से 18 नवंबर 2025
- 📍 स्थान: इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान, लखनऊ
- मुख्य आकर्षण: लोकनृत्य, जनजातीय खानपान, शिल्प मेले, पारंपरिक खेल
- थीम: “भारतीय सभ्यता और संस्कृति में जनजातीय समुदाय का योगदान”
- लक्ष्य: जनजातीय समाज की भागीदारी, गौरव और आत्मनिर्भरता का संदेश देना।
विश्लेषण: उत्सव से संदेश क्या निकला?
- यह आयोजन केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन का संकेत है।
- सरकार यह दिखाना चाहती है कि अब “आदिवासी समाज सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि विकास का सहभागी” है।
- “पहले सीटें खाली रह जाती थीं” — यह वाक्य स्वीकारोक्ति भी है और परिवर्तन की घोषणा भी।
जनता के बीच बढ़ता जनजातीय गौरव
लखनऊ में हुए इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब आदिवासी समाज ‘पहचान की तलाश’ से निकलकर ‘गौरव के उत्सव’ की ओर बढ़ चुका है।
लोगों में एक भावना दिखी — “हम अब इतिहास के हाशिए पर नहीं, केंद्र में हैं।”
निष्कर्ष: धरती आबा का सपना — अब नीति और नीयत में
भगवान बिरसा मुंडा का नारा “अपना देश, अपना राज्य” आज “अपना समाज, अपना सम्मान” में बदल गया है।
योगी सरकार का यह आयोजन इस बात का प्रतीक है कि भारत का लोकतंत्र अब संवेदनशीलता और समानता के उस नए अध्याय में प्रवेश कर चुका है जहाँ हर समुदाय का योगदान सम्मान के साथ याद किया जा रहा है।










