Target Tv Live

यूपी में बिजली कर्मियों का हल्ला बोल : “ऊर्जा क्षेत्र का निजीकरण किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं”

यूपी में बिजली कर्मियों का हल्ला बोल : “ऊर्जा क्षेत्र का निजीकरण किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं”

By Target TV Live | 09 सितम्बर 2025

 ताज़ा हालात

उत्तर प्रदेश का ऊर्जा क्षेत्र इन दिनों जबरदस्त उथल-पुथल से गुजर रहा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाया है कि वह पूरा ऊर्जा क्षेत्र निजी घरानों को सौंपने की तैयारी कर रही है।

यही नहीं, समिति ने यह भी कहा कि सरकार और शीर्ष प्रबंधन निजी कंपनियों से मिलीभगत कर रहे हैं। इस निजीकरण का विरोध करते हुए बिजली कर्मचारियों, संविदा कर्मियों, जूनियर इंजीनियरों और अभियंताओं ने आज प्रदेशभर में जबरदस्त प्रदर्शन किया।

यह आंदोलन अब लगातार 286वें दिन में प्रवेश कर चुका है।

 क्या हैं बिजली कर्मियों के आरोप?

  • निजीकरण की साजिश
    पूर्वांचल और दक्षिणांचल निगम के निजीकरण की चर्चा तो चल रही है, लेकिन वास्तव में पूरे ट्रांसमिशन और उत्पादन क्षेत्र को निजी हाथों में देने की योजना है।
  • टीबीसीबी प्रक्रिया विवाद
    220 केवी और उससे अधिक क्षमता के उपकेंद्र व लाइनें टीबीसीबी प्रक्रिया के तहत निजी कंपनियों को सौंपी जा रही हैं।
  • उत्पादन क्षेत्र पर संकट
    यूपी में कुल बिजली मांग लगभग 31,000 मेगावॉट है, जिसमें सरकारी उत्पादन महज़ 6,000 मेगावॉट (पाँचवाँ हिस्सा) है।
    बड़े प्रोजेक्ट जैसे आनपारा और ओबरा के एक्सटेंशन भी निजी कंपनियों को दिए जा रहे हैं।
  • मनोबल तोड़ने का प्रयास
    शीर्ष प्रबंधन लगातार वेतन रोकने, ट्रांसफर, विजिलेंस जांच और फर्जी FIR जैसी कार्यवाही करके कर्मियों को दबाने की कोशिश कर रहा है।

🔹 मुख्य मांगें

  • 55 साल की उम्र और डाउनसाइजिंग के नाम पर हटाए गए सभी संविदा कर्मियों की बहाली।
  • फेशियल अटेंडेंस विवाद के कारण रुके 10,000 कर्मचारियों के वेतन का भुगतान।
  • फर्जी FIR और स्टेट विजिलेंस जांच को तत्काल रद्द किया जाए।
  • स्मार्ट मीटर लगाने की जबरन प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।
  • उत्पीड़नात्मक ट्रांसफर आदेश रद्द किए जाएं।

 संघर्ष समिति का बयान

संयोजक शैलेन्द्र दुबे ने कहा –

“निजीकरण रोकने की लड़ाई 286 दिन से चल रही है। लेकिन प्रबंधन की नीयत साफ नहीं है। वेतन रोककर और उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयां कर कर्मियों का मनोबल तोड़ा जा रहा है। मगर हम किसी भी कीमत पर निजीकरण स्वीकार नहीं करेंगे।”

 कहाँ-कहाँ हुआ विरोध?

आज वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, अलीगढ़, मथुरा, झांसी, बरेली, अयोध्या, सुल्तानपुर, सहारनपुर, नोएडा, गाजियाबाद, मुरादाबाद, हरदुआगंज, पनकी, ओबरा, पिपरी और अनपरा समेत 30 से अधिक जिलों में हजारों बिजली कर्मियों ने रैली और सभाएं कीं।

 विश्लेषण : क्यों इतना बड़ा मुद्दा?

  1. निजीकरण बनाम सार्वजनिक हित
    • सरकार का तर्क – निजी कंपनियों के आने से कार्यक्षमता और पारदर्शिता बढ़ेगी।
    • कर्मचारी संगठनों का आरोप – निजीकरण से सस्ती बिजली खत्म होगी, रोजगार सुरक्षा डगमगाएगी और उपभोक्ता सीधे प्रभावित होंगे।
  2. राजनीतिक और सामाजिक असर
    • यूपी जैसे बड़े राज्य में यदि बिजली कर्मी लामबंद होकर विरोध जारी रखते हैं, तो यह लोकप्रिय राजनीति पर भी असर डाल सकता है।
    • त्योहारों के समय वेतन रुका रहना कर्मचारियों के परिवारों के लिए बड़ा संकट है।
  3. जनता पर सीधा असर
    • रियायती बिजली की सुविधा खतरे में है।
    • स्मार्ट मीटर लगाने का विरोध उपभोक्ताओं की जेब से सीधे जुड़ा मुद्दा है।

 आगे क्या?

  • यदि सरकार ने जल्द ही समाधान नहीं निकाला तो यह आंदोलन बिजली आपूर्ति को भी प्रभावित कर सकता है।
  • निजीकरण पर सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच सीधी टकराव की स्थिति बन सकती है।
  • यह संघर्ष यूपी की ऊर्जा नीति को नई दिशा दे सकता है।

उत्तर प्रदेश का बिजली संकट सिर्फ बिजली उत्पादन या वितरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह नौकरी सुरक्षा, उपभोक्ता अधिकार और आर्थिक पारदर्शिता का बड़ा सवाल बन चुका है।

बिजली कर्मियों का यह आंदोलन यह साफ करता है कि आने वाले समय में ऊर्जा क्षेत्र यूपी की राजनीति और प्रशासन दोनों के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।

👉 आपकी राय?
क्या आपको लगता है कि बिजली क्षेत्र का निजीकरण उपभोक्ताओं और कर्मचारियों के लिए सही फैसला है, या यह सिर्फ बड़े घरानों को फायदा पहुँचाने की साजिश?

 

Leave a Comment

यह भी पढ़ें