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“₹4000 शहरी, ₹1800 ग्रामीण – शिक्षा नहीं, महज़ खर्च का खेल!”

   शिक्षा का बाज़ार और कोचिंग का जाल

क्यों हर तीसरा बच्चा स्कूल से बाहर पढ़ाई को मजबूर?

By डॉ. प्रियंका सौरभ

“जब विद्यालय शिक्षण का केंद्र नहीं रहते, तो शिक्षा व्यापार बन जाती है।”
भारत की शिक्षा व्यवस्था इस कड़वी सच्चाई का शिकार हो चुकी है। ताज़ा सर्वेक्षण बताता है कि हर तीसरा स्कूली छात्र कोचिंग ले रहा है। शहरी परिवार सालाना औसतन ₹3988, जबकि ग्रामीण परिवार लगभग ₹1793 खर्च कर रहे हैं। सवाल यह है—क्या हमारे स्कूल शिक्षा देने में नाकाम हो रहे हैं?

 स्कूलों की नाकामी, कोचिंग की लत

  • स्कूल में पढ़ाई खत्म, लेकिन ज्ञान अधूरा—बच्चे मजबूरन वही विषय कोचिंग में दोबारा पढ़ते हैं।
  • शिक्षक-छात्र अनुपात बेतुका, शिक्षकों की भारी कमी, कमजोर पढ़ाई—यही हालात बच्चों को कोचिंग सेंटर की तरफ धकेल रहे हैं।
  • परिणाम: स्कूल शिक्षा का मंदिर नहीं, महज़ औपचारिकता बन गए हैं।

 कोचिंग: परिवारों पर दोहरी मार

  • शहरी परिवारों का खर्च ग्रामीण परिवारों से दोगुना।
  • गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार बच्चों की पढ़ाई के नाम पर कर्ज और तनाव झेल रहे हैं।
  • अमीर बच्चे महंगी कोचिंग से आगे बढ़ जाते हैं, गरीब पीछे छूट जाते हैं।
    👉 निष्कर्ष: शिक्षा बराबरी का हक नहीं, असमानता की खाई बन चुकी है।

 कोचिंग = रटंत संस्कृति

  • प्रतियोगी परीक्षाओं और नौकरी की असुरक्षा ने बच्चों को शुरुआत से ही कोचिंग क्लास का “ग़ुलाम” बना दिया है।
  • कोचिंग इंडस्ट्री का फोकस सिर्फ़ अंक और रिज़ल्ट है।
  • सृजनात्मकता, आलोचनात्मक सोच और जीवन मूल्यों की शिक्षा नदारद।
    👉 बच्चा अब “पढ़ा-लिखा इंसान” नहीं, बल्कि “एग्ज़ाम मशीन” बनकर निकल रहा है।

 शहर बनाम गाँव: कोचिंग का फैलता कारोबार

  • शहरों में कोचिंग सेंटर संगठित इंडस्ट्री बन चुके हैं—करोड़ों का कारोबार।
  • गाँवों में अभी व्यक्तिगत ट्यूशन का रूप, लेकिन तेजी से जाल फैल रहा है।
  • सवाल यह है—क्या शिक्षा सच में सबके लिए समान है या सिर्फ़ पैसेवालों का हथियार?

 समाधान: स्कूलों में शिक्षा की वापसी ज़रूरी

  • खाली शिक्षक पद तुरंत भरें।
  • बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण किताबें, आधुनिक पद्धति और व्यावहारिक शिक्षा उपलब्ध कराएँ।
  • विद्यालय को सिर्फ़ “पास कराने का ठिकाना” नहीं, जिज्ञासा और आत्मविश्वास जगाने की प्रयोगशाला बनाया जाए।
  • शिक्षा को व्यवसाय नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी समझा जाए।

आज कोचिंग इंडस्ट्री केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की नाकामी का आईना बन चुकी है।
यदि स्कूलों में विश्वास बहाल नहीं हुआ तो आने वाले वक्त में हर तीसरा नहीं, हर दूसरा बच्चा कोचिंग का कैदी होगा।

👉 शिक्षा का असली मकसद बराबरी और व्यक्तित्व निर्माण है, न कि बच्चों को पैसे और अंकों की दौड़ में झोंकना।

 

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