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इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट शिक्षा के नाम पर ‘कैश काउ’ बन चुके कॉलेज

     इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट

शिक्षा के नाम पर ‘कैश काउ’ बन चुके कॉलेज

संभल में अवैध वसूली का धंधा – एबीवीपी के आंदोलन ने खोली पोल

 घटनाक्रम की शुरुआत

संभल जनपद के गुरु गोविंद सिंह कॉलेज ऑफ एजुकेशन और दयानंद सरस्वती कॉलेज ऑफ एजुकेशन को लेकर एबीवीपी का शनिवार का प्रदर्शन महज़ एक विरोध नहीं था, बल्कि उसने पूरे शिक्षा तंत्र की जमीनी सच्चाई को सामने रख दिया।
छात्रों ने आरोप लगाया कि कॉलेजों में शिक्षा के नाम पर चल रहा है धंधे का कारोबार, जिसमें डिग्री, एडमिशन और पासिंग मार्क्स – सब कुछ पैसों से खरीदा-बेचा जा रहा है।

वसूली का पैटर्न–कैसे चलता है खेल ?

हमने छात्रों और स्थानीय सूत्रों से जो जानकारी जुटाई, उससे पता चलता है कि यह कोई एक-दो दिन की लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित अवैध वसूली का मॉडल है।

  1. प्रैक्टिकल फीस का ब्लैकमेल
    • प्रैक्टिकल परीक्षा के समय छात्रों से कहा जाता है: “अगर पास होना है तो इतने रुपये जमा करो।”
    • बिना पैसे दिए प्रैक्टिकल की कॉपियां जाँच तक नहीं होतीं।
  2. अनुपस्थिति पूरी करने का सौदा
    • जिन छात्रों की उपस्थिति कम होती है, उन्हें क्लास अटेंड कराने के बजाय सीधे सौदा पेश किया जाता है – “पैसे दो और पेपर में बैठो।”
  3. फर्जी एडमिशन का धंधा
    • डी-फार्मा कोर्स में बिना काउंसलिंग सीधे एडमिशन कराए गए।
    • एक छात्रा से पाँच लाख रुपये वसूलने का मामला एबीवीपी ने सार्वजनिक किया।
  4. फीस = डिग्री
    • कॉलेज प्रबंधन पर आरोप है कि “जितना कैश, उतनी आसानी से डिग्री।”
    • असली पढ़ाई, क्लास, लैब – सब केवल नाम के लिए।

 शिक्षा का खोखला ढांचा

कॉलेजों के ढांचे की हकीकत और भी चौंकाने वाली है –

  • न कंप्यूटर लैब, न प्रयोगशाला, न विषयानुसार शिक्षक।

  • न प्राचार्य की नियुक्ति और न ही स्थायी स्टाफ।

  • सुरक्षा व्यवस्था का अभाव – छात्राओं के लिए जोखिम भरा माहौल।👉 यानी पढ़ाई का कोई माहौल नहीं, सिर्फ रसीद और रजिस्टर का कारोबार।

 एबीवीपी की आवाज़

  • लक्षित सिंघल (प्रांत सहमंत्री):
    👉 “ये कॉलेज छात्रों के भविष्य के साथ धोखा कर रहे हैं। फीस वसूलते हैं और फिर बिना शिक्षा दिए डिग्री पकड़ा देते हैं।”
  • विकास शर्मा (विभाग संयोजक):
    👉 “पढ़ाई का कोई मतलब नहीं, केवल पैसों के दम पर छात्र पास हो जाते हैं। शिक्षा का पूरा व्यापारीकरण हो चुका है।”

 प्रशासन की चुप्पी – मिलीभगत या लापरवाही ?

सबसे बड़ा सवाल यही है – जब कॉलेजों में न बुनियादी ढांचा है और न शिक्षक, तो मान्यता कैसे मिली?

  • क्या शिक्षा विभाग ने कभी सख्त निरीक्षण किया?
  • क्या विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच की?
  • या फिर सबकुछ रिश्वत और राजनीतिक दबाव की आड़ में दबा दिया गया?

स्थानीय सूत्र मानते हैं कि बिना अधिकारियों की मिलीभगत इस तरह का खेल संभव ही नहीं।

 बड़ा संकट: छात्रों का भविष्य

इस पूरे धंधे का सबसे बड़ा शिकार छात्र हैं –

  • गरीब और साधारण परिवार के बच्चे फीस जुटाने में कर्जदार हो जाते हैं।
  • पास होने के बाद डिग्री तो हाथ में होती है, लेकिन ज्ञान और कौशल न होने से रोज़गार के अवसर छिन जाते हैं।
  • समाज में अक्षम डिग्रीधारी बेरोज़गारों की फौज खड़ी होती जा रही है।

 आंदोलन की गूंज

एबीवीपी ने प्रशासन को चार दिन का अल्टीमेटम दिया है।
अगर कार्रवाई नहीं हुई तो कॉलेज परिसर में ही अनिश्चितकालीन धरना शुरू होगा।
सैकड़ों की संख्या में छात्र कार्यकर्ताओं की मौजूदगी यह दिखाती है कि यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि जन-आक्रोश का रूप ले रहा है।

 शिक्षा बनाम व्यापार

यह मामला बताता है कि शिक्षा का पवित्र मंदिर आज फीस फैक्ट्री में बदल गया है।
👉 अगर सरकार और प्रशासन ने तुरंत कठोर कदम नहीं उठाए,
👉 अगर कॉलेजों की मान्यता की सख्त समीक्षा नहीं हुई,
👉 और अगर जिम्मेदार अधिकारियों को दंडित नहीं किया गया,
तो यह बीमारी पूरे तंत्र को खोखला कर देगी।

शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि समाज का भविष्य है। और अगर यही भविष्य बिकने लगे, तो यह केवल छात्रों नहीं, पूरे देश के लिए सबसे बड़ा संकट होगा।

 

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