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दर्पण में दरार :  कुंडलिया छंदों में समाज का सच

दर्पण में दरार :  कुंडलिया छंदों में समाज का सच

समीक्षक : चेतना सिंह, बेंगलुरु

डॉ. सत्यवान सौरभ का काव्य-संग्रह “दर्पण में दरार” (प्रथम संस्करण 2025) हिंदी साहित्य में कुंडलिया छंद का समकालीन और सशक्त प्रयोग है। 240 कुंडलियों में रचा गया यह संग्रह परंपरा और प्रयोग का अनोखा संगम है, जिसमें आज के समाज की विडंबनाएँ, संवेदनाएँ और अनदेखे सच उजागर होते हैं।

परंपरा और आधुनिकता

कुंडलिया छंद भक्ति और रीति कवियों से चली आ रही विधा है। डॉ. सौरभ ने दिखाया है कि यह छंद आज भी प्रासंगिक है और आधुनिक जीवन की जटिलताओं को सहजता से अभिव्यक्त कर सकता है।

स्त्री, पुरुष और रिश्तों की पड़ताल

संग्रह का पहला खंड “स्त्री की चुप्पियाँ” स्त्रियों के मौन को आवाज़ देता है और उसे विद्रोह का प्रतीक बना देता है। “पुरुष की पीड़ा” पुरुष के छिपे दुखों को सामने लाता है, जबकि “रिश्तों की रेत” बिखरते पारिवारिक ढाँचों का मार्मिक चित्रण करती है।

सत्ता और मीडिया पर व्यंग्य

“सत्ता-संस्कृति की विडंबनाएँ” और “मंच-मंडियाँ और मीडिया” खंड राजनीति और मीडिया की दोहरी मानसिकता को उजागर करते हैं। ये छंद व्यक्ति-विशेष पर नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की खामियों पर तीखा प्रहार करते हैं।

प्रेम, आत्मा और बचपन

“प्रेम और पराजय” प्रेम की नाजुकता और असफलता का चित्रण है। “आत्मा की पुकार” पाठक को आध्यात्मिक आत्ममंथन की ओर ले जाती है, जबकि “बचपन की चिट्ठियाँ” खोई हुई मासूमियत को जीवंत कर देती हैं।

भाषा और मूल्यांकन

कवि की भाषा सरल, प्रवाहमान और प्रभावशाली है। छंद की अनुशासनबद्धता के बावजूद भाव स्वतंत्र और गहन प्रतीत होते हैं। व्यंग्य की तीक्ष्णता और करुणा की संवेदनशीलता—दोनों का संतुलन संग्रह को विशेष बनाता है।

निष्कर्ष

“दर्पण में दरार” केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि समकालीन समाज का साहित्यिक घोषणापत्र है। यह संग्रह परंपरागत छंद को पुनर्जीवित करता है और हमें अपने भीतर झाँकने पर मजबूर करता है। निस्संदेह, यह समकालीन हिंदी कविता में एक आवश्यक और महत्वपूर्ण योगदान है।

पुस्तक विवरण :

  • दर्पण में दरार (कुंडलिया छंद) | लेखक : डॉ. सत्यवान सौरभ | प्रकाशक : आर.के. फीचर्स, भिवानी | संस्करण : प्रथम, 2025 | मूल्य : ₹250 | पृष्ठ : 120

 

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