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76,500 कर्मचारियों की नौकरी पर खतरा, संघर्ष समिति का ‘निर्णायक आंदोलन’ ऐलान

बिजली निजीकरण विवाद: 76,500 कर्मचारियों की नौकरी पर खतरा, संघर्ष समिति का ‘निर्णायक आंदोलन’ ऐलान

  • 267 दिन से जारी है हड़ताल: अब निर्णायक संघर्ष की तैयारी

  • तीन विकल्पों पर विवाद: निजी कंपनी, अन्य निगम या स्वैच्छिक रिटायरमेंट

  • दिल्ली-चंडीगढ़ का उदाहरण: निजीकरण के बाद बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की विदाई

  • “सेवा करेंगे और हक भी लेंगे”: संघर्ष समिति का नारा

समाचार का सार

उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण का विरोध चरम पर पहुँच गया है।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया है कि यदि पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम का निजीकरण किया गया तो 76,500 बिजली कर्मचारियों की नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।

आंदोलन 267वें दिन पहुँच चुका है और अब समिति ने “निर्णायक संघर्ष” का बिगुल फूंक दिया है।

मुख्य बिंदु (Bullet Points)

  • ✒️ निजीकरण से प्रभावित कर्मचारी संख्या
    • पूर्वांचल निगम: 17,500 नियमित कर्मचारी
    • दक्षिणांचल निगम: 10,500 नियमित कर्मचारी
    • संविदा कर्मचारी: लगभग 50,000
  • ✒️ पावर कॉर्पोरेशन का प्रस्तावित विकल्प
    1. निजी कंपनी की नौकरी स्वीकार करें
    2. अन्य विद्युत निगमों में वापस जाएँ
    3. स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लें
  • ✒️ कर्मचारियों की आपत्तियाँ
    • निजी कंपनी में लौटना अन्यायपूर्ण, क्योंकि कई कर्मचारी सरकारी नौकरी के लिए निजी कंपनियाँ छोड़कर आए थे।
    • अन्य निगमों में जाने पर सरप्लस घोषित होने और छंटनी की आशंका।
    • नई वरिष्ठता सूची में नीचे आने से प्रमोशन और नौकरी सुरक्षा खत्म होगी।
  • ✒️ देश के उदाहरणों का हवाला
    • दिल्ली 2002: निजीकरण के एक साल के भीतर 45% बिजली कर्मचारी सेवानिवृत्त हुए।
    • चंडीगढ़ 2025: निजीकरण के पहले ही दिन 40% कर्मचारी रिटायरमेंट पर चले गए।
  • ✒️ संघर्ष समिति का रुख
    • “निजीकरण बिजली कर्मचारियों और उनके परिवार के लिए अंधेरा लेकर आ रहा है।”
    • “सेवा करेंगे और हक भी लेंगे।”
    • निजीकरण का फैसला वापस लेने तक संघर्ष जारी रहेगा।

विश्लेषण: क्यों बढ़ रही है चिंता?

  • कर्मचारी सुरक्षा पर सवाल: निजी कंपनियों में नौकरी की स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ सीमित होती हैं।
  • पेंशन संकट: वर्तमान में 90% बिजली कर्मियों को पेंशन नहीं मिलती, ऐसे में स्वैच्छिक रिटायरमेंट विकल्प निरर्थक साबित हो रहा है।
  • उपभोक्ता हित प्रभावित: संघर्ष समिति का दावा है कि वे उपभोक्ताओं की समस्याओं को भी प्राथमिकता पर देख रहे हैं, लेकिन लगातार आंदोलन से बिजली आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका बनी हुई है।
  • राजनीतिक दबाव: बिजली जैसे संवेदनशील क्षेत्र में लंबे आंदोलन का असर सीधे प्रदेश सरकार पर पड़ेगा।

संघर्ष समिति का संदेश

“हम बिजली की सेवा करेंगे, लेकिन अपने हक भी लेंगे।
निजीकरण किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं।”

 यह संघर्ष केवल कर्मचारियों की नौकरी बचाने की जंग नहीं, बल्कि बिजली क्षेत्र के भविष्य, उपभोक्ता हितों और सरकारी नियंत्रण बनाम निजी हाथों में जिम्मेदारी की बहस का हिस्सा भी बन चुका है।

 

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