बिजली महापंचायत: निजीकरण के विरोध में कर्मचारियों की हुंकार

वाराणसी। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश और नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी इंप्लाइज एंड इंजीनियर्स के आह्वान पर वाराणसी में आयोजित बिजली महापंचायत ने बिजली निजीकरण के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन किया। हजारों कर्मचारियों की उपस्थिति में पारित प्रस्ताव के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के निर्णय को निरस्त करने की मांग की गई।
बिजली महापंचायत का स्वरूप और प्रमुख मांगें
महापंचायत में बिजली कर्मियों ने एक स्वर में निजीकरण के दुष्प्रभावों को उजागर किया। प्रस्ताव में उल्लेख किया गया कि निजीकरण से उपभोक्ताओं को तीन गुना अधिक शुल्क चुकाना पड़ेगा। मुंबई, कोलकाता, और दिल्ली के उदाहरण देते हुए बताया गया कि निजी कंपनियों के चलते वहां बिजली दरें अत्यधिक ऊंची हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में अब भी अपेक्षाकृत सस्ती दरें लागू हैं।
महापंचायत में कर्मचारियों ने आगरा के टोरेंट पावर और कानपुर के केस्को की तुलना करते हुए बताया कि सरकारी क्षेत्र में रहते हुए भी केस्को अधिक राजस्व उत्पन्न कर रहा है, जबकि आगरा में निजीकरण से पावर कॉरपोरेशन को भारी नुकसान हो रहा है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार 42 जनपदों में बिजली वितरण का निजीकरण करने पर अड़ी हुई है।
संविदा कर्मचारियों के मुद्दे पर आक्रोश
महापंचायत में संविदा कर्मचारियों को बहाल न किए जाने पर भी गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया। मार्च 2023 की हड़ताल के दौरान सरकार द्वारा किए गए समझौते के बावजूद संविदा कर्मियों की बहाली नहीं की गई, जिससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। प्रस्ताव में इस मुद्दे पर सरकार से तुरंत कार्रवाई करने की मांग उठाई गई।
सरकारी दमन और आंदोलन की आगे की रूपरेखा
महापंचायत को रोकने के लिए पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के प्रबंध निदेशक ने निगम के मुख्य द्वार को बंद करवा दिया, जिससे कर्मचारियों में नाराजगी और बढ़ गई। बावजूद इसके, कर्मचारियों ने संयम बनाए रखते हुए तीन घंटे तक शांतिपूर्ण महापंचायत की।
महापंचायत के अंत में आगामी 9 अप्रैल को लखनऊ में होने वाली विशाल रैली का आह्वान किया गया, जिसे निर्णायक आंदोलन के रूप में देखा जा रहा है।
विश्लेषण: बिजली निजीकरण के खिलाफ बढ़ता असंतोष
बिजली महापंचायत से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मी निजीकरण के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष कर रहे हैं। निजीकरण को उपभोक्ताओं और कर्मचारियों दोनों के लिए हानिकारक बताया जा रहा है। आगरा और कानपुर का तुलनात्मक अध्ययन सरकार की निजीकरण नीति पर सवाल खड़े करता है।
सरकार यदि इस मुद्दे पर जल्द निर्णय नहीं लेती है तो यह आंदोलन और व्यापक हो सकता है। 9 अप्रैल की लखनऊ रैली इस संघर्ष की दिशा तय करेगी। कर्मचारियों के इस व्यापक समर्थन को देखते हुए सरकार के लिए निजीकरण के फैसले पर पुनर्विचार करना अपरिहार्य हो सकता है।











