बिजनौर में खनन माफिया का तांडव: किसानों की जमीन लूटकर सरकार को चूना, अधिकारी बने माफिया के दलाल
बिजनौर। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नगीना तहसील में खनन माफिया की दबंगई चरम पर है। पट्टों की आड़ में किसानों की जमीनों को बर्बाद किया जा रहा है, सरकार को करोड़ों की राजस्व हानि हो रही है, और प्रशासन चुपचाप तमाशा देख रहा है। हालात इतने भयावह हैं कि शिकायत करने पर किसानों को बाउंसरों से धमकाया जाता है, और स्थानीय अधिकारी माफिया के इशारों पर नाचते नजर आ रहे हैं।
भारतीय किसान यूनियन (भानु) के प्रदेश उपाध्यक्ष गौतम शर्मा ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस लूट की पूरी कहानी बयां की है और एसआईटी जांच की मांग की है।
खनन पट्टों की आड़ में सरकारी जमीन और खेतों की लूट
खनन पट्टाधारक गांव अबुल फजलपुर पहाड़ा में गाटा संख्या 70 एम आई पर एमपीएस इन्टरप्राइजेज के नाम से आरबीएम का छः माह के लिए पट्टा जारी किया गया है, जो क्षेत्र आवंटित किया गया है, वे उससे कहीं आगे जाकर ग्राम समाज और किसानों की निजी जमीनों को खोद रहे हैं। पोकलेन मशीनों से दिन-रात अवैध खनन हो रहा है, जिससे जमीन में 25 फीट गहरे गड्ढे बन गए हैं। इससे किसानों की उपजाऊ मिट्टी खत्म हो रही है, फसलें उजड़ रही हैं, और भूजल स्तर भी गिर रहा है।
बाउंसरों की फौज, विरोध करने पर जान का खतरा
खनन स्थलों पर माफिया ने बाउंसरों की फौज खड़ी कर रखी है, जो किसानों को धमकाते हैं और विरोध करने पर पीटने तक से नहीं चूकते। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि किसान अपने ही खेतों में जाने से डर रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारी भी मौके पर जाने से कतराते हैं, मानो माफिया के आगे उनकी गर्दन झुकी हो।
मुख्यमंत्री से रिश्तों की धमकी: “ऊपर तक सब सेट है”
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये माफिया खुलेआम मुख्यमंत्री से सीधे संबंध होने की डींगें हांकते हैं। वे कहते हैं कि चाहे जितनी शिकायतें हों, ऊपर तक सब मैनेज है। इससे किसानों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है, क्योंकि उन्हें लगता है कि सत्ता की छतरी के नीचे ये माफिया बेलगाम होकर लूटपाट कर रहे हैं।
GPS डेटा और स्टोरेज डिपो से खुलेगा पूरा राज
गौतम शर्मा ने मांग की है कि खनन वाहनों के GPS डेटा की जांच कराई जाए। सिर्फ 15 दिन का डेटा बता देगा कि कितनी अवैध खदानें चलाई जा रही हैं और सरकार को कितनी करोड़ों की राजस्व हानि हुई है। साथ ही, खनन सामग्री के भंडारण डिपो की जांच से पता चलेगा कि चोरी की सामग्री कितनी मात्रा में जमा हो रही है।
सरकार की चुप्पी या मिलीभगत?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब खनन माफिया खुलेआम कह रहे हैं कि “ऊपर तक सेटिंग” है, तो क्या प्रशासनिक चुप्पी सिर्फ डर है या सीधी मिलीभगत? क्या अफसर और नेता खनन माफिया के हिस्सेदार बन चुके हैं? और अगर ऐसा नहीं है, तो अब तक कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
किसानों की ललकार: या कार्रवाई, या क्रांति!
अब पश्चिमी यूपी के किसान आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। अगर जल्द ही एसआईटी जांच, माफिया पर रासुका (NSA), और अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के मुकदमे नहीं चले, तो किसानों ने बड़ा आंदोलन छेड़ने की चेतावनी दी है।
ये मामला अब सिर्फ बिजनौर का नहीं रहा — ये पूरे प्रदेश की कानून-व्यवस्था और सरकार की साख का सवाल बन चुका है। अगर मुख्यमंत्री ने खुद मोर्चा नहीं संभाला, तो ये मुद्दा सरकार के लिए राजनीतिक भूकंप बन सकता है।
(विशेष रिपोर्ट: स्वतंत्र पत्रकारिता टीम, बिजनौर)












