समाज के वंचित वर्ग को भी मिले पीने को दूध: समान पोषण की ओर एक आवश्यक कदम

रिपोर्ट: डॉ. सत्यवान सौरभ
नई दिल्ली। भारत, जो विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है, वहाँ आज भी दूध की उपलब्धता और खपत में गहरी असमानता बनी हुई है। देश के वंचित वर्गों, विशेष रूप से निम्न-आय वाले परिवारों और आदिवासी समुदायों के बीच दूध का उपभोग काफी सीमित है, जिससे कुपोषण की समस्या गहराती जा रही है। इस असमानता को दूर करने और समाज के सभी वर्गों के लिए पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस नीतिगत उपायों की आवश्यकता है।
डॉ. सत्यवान सौरभ के अनुसार, “दूध की असमान पहुँच से न केवल आर्थिक असमानता झलकती है, बल्कि यह कुपोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को भी बढ़ावा देती है। सरकार को पोषण कार्यक्रमों में सुधार कर वित्तीय सहायता बढ़ानी चाहिए, जिससे वंचित समूहों तक दूध की समान उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।”
आर्थिक असमानता और दूध की खपत
भारत में उच्चतम आय वर्ग के लोग निम्न-आय वर्ग की तुलना में तीन से चार गुना अधिक दूध का उपभोग करते हैं। आँकड़ों के अनुसार, सबसे कम आय वाले 30% परिवार देश के कुल दूध उत्पादन का केवल 18% उपभोग करते हैं। राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में प्रति व्यक्ति दूध की खपत 333 से 421 ग्राम प्रतिदिन है, जबकि छत्तीसगढ़ और ओडिशा में यह मात्र 75 से 171 ग्राम प्रतिदिन तक सीमित है।
आदिवासी समुदायों की स्थिति और भी चिंताजनक है। अनुसूचित जनजाति (एसटी) परिवार सामान्य रूप से अन्य समुदायों की तुलना में प्रति व्यक्ति चार लीटर कम दूध का उपभोग करते हैं। इसके पीछे प्रमुख कारण आर्थिक कठिनाइयाँ, सांस्कृतिक खाद्य प्राथमिकताएँ और डेयरी बाजारों तक सीमित पहुँच हैं।
नीतिगत उपाय और समाधान
सरकार की प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना और एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) जैसी योजनाओं को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि स्कूलों में बच्चों को नियमित रूप से दूध मिल सके। कुछ राज्य, जैसे कर्नाटक और गुजरात, पहले से ही अपने स्कूल पोषण कार्यक्रमों में दूध प्रदान कर रहे हैं, लेकिन कवरेज का विस्तार करने से बच्चों के स्वास्थ्य में और सुधार हो सकता है।
डॉ. सत्यवान सौरभ ने सुझाव दिया कि जरूरतमंद परिवारों के लिए “दूध वाउचर” या कूपन योजना लागू की जा सकती है। गुजरात की डेयरी सहकारी समितियाँ इस दिशा में पहले से ही प्रयासरत हैं और स्थानीय दुकानों पर भुनाए जाने वाले कूपन प्रदान कर रही हैं।
साथ ही, सामाजिक बांड, सीएसआर फंडिंग और अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों पर कर लगाकर सब्सिडी वाले दूध वितरण के लिए धन जुटाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, आइसक्रीम और उच्च चीनी युक्त डेयरी उत्पादों पर एक मामूली कर लगाया जा सकता है, जिससे दूध की कीमतें गरीब परिवारों के लिए किफायती हो सकें।
जागरूकता और सार्वजनिक भागीदारी
आंगनवाड़ी केंद्रों, स्वयं सहायता समूहों और मीडिया अभियानों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में दूध के पोषण लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। महाराष्ट्र के पोषण माह 2024 अभियान ने संतुलित आहार को लेकर ग्रामीण समुदायों में जागरूकता बढ़ाने में सफलता पाई है।
इसके अलावा, अत्यधिक डेयरी सेवन को रोकने और संतुलित आहार को बढ़ावा देने के लिए, ब्रिटेन के “Change4Life Sugar Swap” अभियान की तर्ज़ पर स्वास्थ्य संदेश प्रसारित किए जा सकते हैं। डॉक्टर और पोषण विशेषज्ञ, स्वस्थ डेयरी उपभोग पैटर्न को प्रोत्साहित कर, मोटापा और गैर-संचारी रोगों के बढ़ते खतरे को कम कर सकते हैं।
सुधार की दिशा में कदम
दूध की खपत की असमानताओं को दूर करने के लिए लक्षित सब्सिडी, मज़बूत सार्वजनिक वितरण प्रणाली और छोटे पैमाने पर डेयरी फार्मिंग के लिए प्रोत्साहन आवश्यक हैं। कोल्ड स्टोरेज और वितरण नेटवर्क में सुधार से दूरदराज के क्षेत्रों में दूध की पहुँच बढ़ाई जा सकती है।
एक बहु-हितधारक दृष्टिकोण, जिसमें सरकार, डेयरी उद्योग, सामाजिक संगठनों और नागरिकों की भागीदारी हो, से भारत में पोषण सुरक्षा को मज़बूती मिलेगी और समाज के सभी वर्गों को दूध की समान उपलब्धता सुनिश्चित होगी। इससे एक स्वस्थ और अधिक न्यायसंगत भारत की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो सकेगी।











