बार-बार निर्देश क्यों? बिजनौर के स्कूलों में व्यवस्था सुधारने के आदेशों के बीच उठे जवाबदेही पर बड़े सवाल

बिजनौर, 14 अगस्त 2026 | अवनीश त्यागी, TargetTvLive
बिजनौर। बेसिक शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में जिलाधिकारी ने एक बार फिर सरकारी विद्यालयों की व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए। गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई, साफ-सफाई, मध्यान्ह भोजन, बच्चों की सुरक्षा, डिजिटल बोर्ड, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की व्यवस्थाएं और आधारभूत सुविधाओं को लेकर अधिकारियों को दिशा-निर्देश दिए गए।
लेकिन इस पूरी कवायद के बीच एक सवाल बेहद अहम है—जब जिलाधिकारी को इन व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने के लिए बार-बार निर्देश देने पड़ रहे हैं, तो क्या इसका मतलब यह है कि पहले दिए गए निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा?
यही सवाल इस समीक्षा बैठक को महज एक नियमित प्रशासनिक बैठक से आगे ले जाता है।
बार-बार निर्देश आखिर किस बात का संकेत?
सरकारी विद्यालयों में साफ-सफाई, बच्चों की सुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मध्यान्ह भोजन और मूलभूत सुविधाएं कोई नई प्राथमिकताएं नहीं हैं। इनके लिए विभागीय नियम और जिम्मेदारियां पहले से निर्धारित हैं।
ऐसे में यदि जिलाधिकारी को समीक्षा बैठक में बार-बार इन्हीं बिंदुओं पर निर्देश देने पड़ रहे हैं तो इसके दो संभावित अर्थ निकलते हैं—या तो मैदानी स्तर पर निर्देशों का अपेक्षित अनुपालन नहीं हो रहा, या फिर अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था उतनी प्रभावी नहीं है जितनी होनी चाहिए।
दोनों ही स्थितियां जवाबदेही का सवाल खड़ा करती हैं।
भोजन की गुणवत्ता पर फिर निर्देश, तो पहले की निगरानी कितनी प्रभावी?
मध्यान्ह भोजन को निर्धारित मेन्यू के अनुसार, स्वच्छ और पौष्टिक तरीके से उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए। रसोईघर की सफाई, खाद्यान्न के सुरक्षित भंडारण और रसोइयों की व्यक्तिगत स्वच्छता पर भी जोर दिया गया।
यहां सवाल सीधा है—यदि इन सभी व्यवस्थाओं के लिए पहले से स्पष्ट नियम हैं तो बार-बार उच्चस्तरीय निर्देश की जरूरत क्यों पड़ रही है?
अधिकारियों को बच्चों के साथ बैठकर भोजन करने और उनका फीडबैक लेने का निर्देश निश्चित रूप से जमीनी हकीकत जानने का अच्छा माध्यम है। लेकिन यदि निरीक्षण में कमी मिलती है तो उसके बाद जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी होगी।
सफाई पर लगातार जोर, फिर भी समस्या क्यों?
विद्यालयों के शौचालय, पेयजल स्थल, कक्षाएं, रसोईघर, हैंडवॉश स्टेशन और पूरे परिसर की सफाई को लेकर भी निर्देश दिए गए।
लेकिन यही बात फिर सवाल खड़ा करती है। क्या नियमित निरीक्षण और विभागीय निगरानी के बावजूद सफाई व्यवस्था अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही?
यदि ऐसा है तो केवल सफाई के निर्देश देना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि यह भी तय हो कि लापरवाही किस स्तर पर हुई और उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी।
कस्तूरबा विद्यालयों में सिर्फ सुविधाएं नहीं, भर्ती प्रक्रिया भी अहम
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में छात्राओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, स्वच्छता, छात्रावास और काउंसलिंग जैसी व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान देने को कहा गया।
लेकिन कस्तूरबा विद्यालयों की चर्चा में शिक्षक भर्ती प्रक्रिया से जुड़े सवालों और कथित अनियमितताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यदि भर्ती प्रक्रिया को लेकर शिकायतें या सवाल उठे हैं तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उनकी जांच किस स्तर तक पहुंची और जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई क्या हुई?
क्या ऐसे मामलों में भी केवल सुधार के निर्देश पर्याप्त हैं, या पिछली प्रक्रिया की जांच कर दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है?
यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक निर्देश और जवाबदेही के बीच अंतर दिखाई देता है।
डिजिटल बोर्ड और लैब: संसाधन हैं तो इस्तेमाल भी होना चाहिए
विद्यालयों में कंप्यूटर, डिजिटल बोर्ड, आईसीटी और एस्ट्रोनॉमी लैब के प्रभावी इस्तेमाल के निर्देश दिए गए हैं।
यह पहल बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। लेकिन सवाल फिर वही है—क्या पहले से उपलब्ध संसाधनों के उपयोग की नियमित निगरानी नहीं हो रही थी?
यदि उपकरण मौजूद हैं लेकिन उनका उपयोग अपेक्षित स्तर पर नहीं हो रहा, तो केवल उपयोग करने का निर्देश देने के बजाय यह भी तय करना जरूरी है कि उपयोग की निगरानी कौन करेगा और लापरवाही पर क्या कार्रवाई होगी।
समीक्षा बैठक की असली कसौटी अगली समीक्षा होगी
जिलाधिकारी ने बैठक में अधिकारियों को नियमित विद्यालय निरीक्षण करने, विद्यार्थियों से संवाद करने, शिक्षकों का उत्साह बढ़ाने और व्यवस्थाओं का वास्तविक आकलन करने को कहा।
अब इस बैठक की सफलता का आकलन अगली समीक्षा में सामने आने वाले आंकड़ों और जमीनी स्थिति से होगा।
यदि अगली बार विद्यालयों में वही कमियां फिर मिलती हैं और एक बार फिर सुधार के निर्देश जारी होते हैं तो सवाल और गंभीर होगा कि आखिर निर्देशों के बावजूद व्यवस्था क्यों नहीं सुधर रही?
क्या बार-बार निर्देश व्यवस्था की कमजोरी बता रहे हैं?
प्रशासनिक दृष्टि से निर्देश देना जरूरी है। लेकिन बार-बार एक ही विषय पर निर्देश दिए जाने की स्थिति यह भी बताती है कि कहीं न कहीं निगरानी, क्रियान्वयन या जवाबदेही की कड़ी कमजोर है।
एक मजबूत व्यवस्था में निर्देश के बाद अनुपालन की जांच होती है। कमी मिलने पर जिम्मेदारी तय होती है और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई होती है। तभी अगली समीक्षा में सुधार दिखाई देता है।
इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं कि डीएम ने क्या निर्देश दिए? असली सवाल यह है कि पहले दिए गए निर्देशों पर कितना अमल हुआ, अमल नहीं हुआ तो जिम्मेदार कौन है और अब कार्रवाई क्या होगी?
निर्देश से आगे बढ़कर जवाबदेही तय करने की जरूरत
बिजनौर के सरकारी विद्यालयों की तस्वीर बदलने के लिए समीक्षा बैठक में दिए गए निर्देश महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन निर्देशों का असर तभी दिखाई देगा जब उन्हें समयबद्ध अनुपालन, नियमित निगरानी और स्पष्ट जवाबदेही से जोड़ा जाएगा।
मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता हो, सफाई व्यवस्था हो, बच्चों की सुरक्षा हो या कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की भर्ती प्रक्रिया—हर मामले में व्यवस्था सुधारने के साथ यह भी जरूरी है कि लापरवाही या अनियमितता मिलने पर जिम्मेदारी तय हो।
क्योंकि बार-बार निर्देश देना समाधान की शुरुआत हो सकता है, लेकिन समाधान का प्रमाण तभी माना जाएगा जब अगली बार उसी समस्या पर निर्देश देने की जरूरत न पड़े।
अब देखना यह होगा कि जिलाधिकारी की इस समीक्षा बैठक के बाद विद्यालयों में वास्तव में बदलाव आता है या फिर अगली समीक्षा बैठक में एक बार फिर वही निर्देश दोहराए जाते हैं।
TargetTvLive के लिए अवनीश त्यागी की रिपोर्ट।












