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“AI कितना बुद्धिमान है, यह नहीं; वह कितना न्यायपूर्ण है—ब्राजील में डॉ. विवेक त्यागी ने उठाया दुनिया के सामने बड़ा सवाल”

मशीन के पास बुद्धि जैसी क्षमता, लेकिन न्याय के लिए चाहिए विवेक! ब्राजील में डॉ. विवेक त्यागी ने उठाया AI शासन का बुनियादी सवाल

24 देशों के अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय न्याय-दर्शन, राजधर्म और नागरिक अधिकारों के संबंध को किया रेखांकित; सवाल यह कि तकनीक की गलती की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?
TargetTvLive | अवनीश त्यागी

मेरठ/लोंड्रीना (ब्राजील)। कल्पना कीजिए कि किसी गरीब व्यक्ति का राशन केवल इसलिए बंद हो जाए कि कंप्यूटर प्रणाली ने उसके रिकॉर्ड को संदिग्ध मान लिया। किसी योग्य लाभार्थी की पेंशन तकनीकी विसंगति के कारण रुक जाए। किसी व्यक्ति को आंकड़ों के आधार पर जोखिम वाला घोषित कर दिया जाए, लेकिन उसे यह तक न बताया जाए कि उसके खिलाफ निष्कर्ष किस आधार पर निकाला गया। ऐसी स्थिति में सवाल केवल तकनीक की कार्यक्षमता का नहीं, बल्कि न्याय, जवाबदेही और मानवीय गरिमा का बन जाता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विस्तार के साथ दुनिया के सामने उभर रही यही चुनौती ब्राजील के लोंड्रीना में आयोजित अंतरराष्ट्रीय विश्व कांग्रेस में चर्चा के केंद्र में रही। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (CCSU), मेरठ के विधि अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने अपने शोधपत्र “Where Code Meets Conscience: Governing Intelligence, Guarding Liberty” के माध्यम से इस बुनियादी प्रश्न को रेखांकित किया कि क्या आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली मशीन को ऐसे निर्णयों की निर्णायक शक्ति दी जा सकती है, जिनका सीधा असर किसी इंसान के अधिकारों और भविष्य पर पड़ता हो?

24 देशों के विशेषज्ञों और 138 वक्ताओं की भागीदारी वाले इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में प्रस्तुत उनका दृष्टिकोण भारतीय ज्ञान परंपरा के राजधर्म, न्याय-दर्शन, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और सम्राट अशोक के शिलालेखों को आधुनिक AI शासन की चुनौतियों से जोड़ता है। इस विमर्श का वास्तविक महत्व तकनीक और परंपरा के बीच किसी प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि इस बात में है कि आधुनिक शासन को अधिक कुशल बनाने के साथ उसे न्यायपूर्ण और जवाबदेह कैसे रखा जाए।

असली सवाल AI कितना बुद्धिमान है, यह नहीं; वह किसके हित में काम करता है?

AI बड़ी मात्रा में उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर सकता है, उनमें मौजूद पैटर्न पहचान सकता है और संभावित परिणामों का अनुमान लगा सकता है। इससे प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं में कई लाभ मिल सकते हैं। लेकिन आंकड़ों से निकला निष्कर्ष अपने आप में न तो नैतिक निर्णय है और न ही न्याय का प्रमाण।

यहीं बुद्धि और विवेक के बीच अंतर समझना जरूरी हो जाता है।

बुद्धि का एक महत्वपूर्ण पक्ष तथ्यों, सूचनाओं और परिस्थितियों के बीच संबंध पहचानना तथा किसी समस्या का समाधान निकालना है। विवेक का संबंध उस समाधान की उचित-अनुचितता, उसके परिणामों और मानवीय मूल्यों के आधार पर निर्णय करने से है। ये दोनों क्षमताएं मनुष्य में भी अलग-अलग स्तरों पर काम करती हैं। AI विश्लेषण और अनुमान में सक्षम हो सकता है, लेकिन उससे नैतिक जिम्मेदारी या मानवीय चेतना स्वतः उत्पन्न हो जाने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

मसलन, कोई एल्गोरिदम यह अनुमान लगा सकता है कि किन क्षेत्रों में अपराध की आशंका अधिक है। लेकिन उस अनुमान के आधार पर किसी व्यक्ति को संदेह के घेरे में रखना उचित होगा या नहीं, यह केवल गणितीय गणना से तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए प्रमाण, कानून, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भेदभाव से सुरक्षा जैसे प्रश्नों पर विचार करना होगा।

तकनीकी रूप से सटीक अनुमान और न्यायसंगत निर्णय एक ही चीज नहीं हैं। डॉ. त्यागी की प्रस्तुति का महत्व इसी अंतर को शासन और कानून की बहस से जोड़ने में दिखाई देता है।

जब एल्गोरिदम की गलती नागरिक का अधिकार छीन ले

डिजिटल शासन में AI का उपयोग तभी तक जनकल्याणकारी है, जब तक वह नागरिकों के लिए सुविधाएं बढ़ाता है और प्रशासनिक निर्णयों को बेहतर बनाने में मदद करता है। समस्या तब पैदा होती है, जब मशीन से निकले निष्कर्ष को बिना पर्याप्त जांच के अंतिम निर्णय मान लिया जाता है।

इसके कम से कम चार गंभीर खतरे हैं।

पहला, अपारदर्शिता। यदि किसी नागरिक को सरकारी सुविधा से वंचित कर दिया गया, लेकिन उसे निर्णय का आधार समझ में नहीं आया, तो वह अपनी गलती कैसे सुधारेगा और निर्णय को चुनौती कैसे देगा?

दूसरा, आंकड़ों में छिपा भेदभाव। पुराना डेटा यदि सामाजिक, आर्थिक या प्रशासनिक पक्षपात से प्रभावित रहा है, तो उस पर प्रशिक्षित प्रणाली उन्हीं असमानताओं को दोहरा सकती है। आधुनिक तकनीक होने का अर्थ यह नहीं कि उसके परिणाम अपने आप निष्पक्ष हो जाएंगे।

तीसरा, जवाबदेही का संकट। गलत निर्णय होने पर विभाग तकनीकी प्रणाली, तकनीकी कंपनी या डेटा की त्रुटि का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर सकता है। इसलिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि निर्णय किसने लिया, किस आधार पर लिया और उसे सुधारने का दायित्व किसका है।

चौथा, मानवीय समीक्षा का अभाव। यदि नागरिक को अपनी बात रखने, रिकॉर्ड में सुधार कराने या किसी सक्षम अधिकारी से पुनर्विचार कराने का वास्तविक अवसर नहीं मिलता, तो स्वचालन सुविधा के बजाय अधिकारों में बाधा बन सकता है।

इन जोखिमों का समाधान AI को पूरी तरह नकारना नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें उसकी उपयोगिता बनी रहे, लेकिन उसकी सीमाएं भी स्वीकार की जाएं और नागरिकों के अधिकार किसी तकनीकी प्रक्रिया के भरोसे असुरक्षित न छोड़ दिए जाएं।

भारतीय राजधर्म की प्रासंगिकता: सत्ता साधन है, साध्य नहीं

डॉ. त्यागी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के जिन सिद्धांतों को आधुनिक AI शासन से जोड़ा, उनमें राजधर्म विशेष महत्व रखता है।

राजधर्म की मूल भावना को शासन की जवाबदेही और लोककल्याण के संदर्भ में समझें तो इसका अर्थ है कि सार्वजनिक सत्ता का इस्तेमाल शासक या प्रशासन की सुविधा भर के लिए नहीं, बल्कि जनता के हित में होना चाहिए। इसी कसौटी पर AI का इस्तेमाल भी परखा जाना चाहिए।

यदि कोई तकनीकी व्यवस्था सरकारी कामकाज तेज कर देती है, लेकिन पात्र नागरिकों को योजनाओं से बाहर कर देती है, तो केवल गति को उसकी सफलता नहीं कहा जा सकता। यदि निगरानी की क्षमता बढ़ती है, लेकिन निजता और स्वतंत्रता के लिए पर्याप्त सुरक्षा नहीं है, तो तकनीकी प्रगति के साथ संवैधानिक जोखिम भी बढ़ सकते हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र से जोड़ी गई शासन और लोककल्याण की दृष्टि तथा अशोक के शिलालेखों में दिखाई देने वाली प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व की भावना आधुनिक प्रशासन के लिए एक नैतिक कसौटी प्रस्तुत कर सकती है। हालांकि प्राचीन सिद्धांतों को आज के संदर्भ में लागू करने के लिए उनके अर्थ और वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के बीच सावधानीपूर्वक संबंध स्थापित करना आवश्यक है।

इसी संदर्भ में “धर्मो रक्षति रक्षितः” का संदेश महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां धर्म को किसी संकीर्ण धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि न्याय, कर्तव्य और नैतिक मर्यादा के व्यापक संदर्भ में समझा जाए, तो यह सिद्धांत शासन को याद दिलाता है कि अधिकारों और न्याय की रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी है।

न्याय-दर्शन और AI: अनुमान को प्रमाण समझने की भूल न हो

भारतीय न्याय-दर्शन में ज्ञान प्राप्त करने के साधनों और किसी निष्कर्ष की वैधता पर विचार की समृद्ध परंपरा रही है। प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द जैसे प्रमाणों की अवधारणाएं इस प्रश्न की ओर ध्यान दिलाती हैं कि किसी दावे को स्वीकार करने का आधार क्या है और निष्कर्ष तक पहुंचने की प्रक्रिया कितनी विश्वसनीय है।

AI के संदर्भ में यह विचार उपयोगी है।

किसी प्रणाली ने आंकड़ों में एक पैटर्न पहचाना, इसका अर्थ यह नहीं कि उस पैटर्न के आधार पर निकाला गया प्रत्येक निष्कर्ष सही होगा। दो घटनाओं के बीच सांख्यिकीय संबंध मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि एक घटना दूसरी का कारण है। अधूरे आंकड़े, गलत मान्यताएं और पक्षपाती नमूने परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए AI से प्राप्त निष्कर्ष को सत्यापन, संदर्भ और स्वतंत्र परीक्षण की कसौटी पर परखना चाहिए। किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाले निर्णय में यह भी देखना जरूरी है कि निष्कर्ष के समर्थन में पर्याप्त तथ्य हैं या केवल संभाव्यता।

यहां न्याय-दर्शन और आधुनिक तकनीकी ऑडिट के बीच एक विचारात्मक समानता दिखाई देती है: दोनों ही किसी निष्कर्ष को केवल इसलिए स्वीकार करने के बजाय उसके आधार और विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की गुंजाइश देते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि प्राचीन दर्शन आधुनिक एल्गोरिदम का तकनीकी विकल्प है, बल्कि यह कि प्रमाण और तर्क के प्रति उसकी प्रतिबद्धता आज भी विचार के लिए उपयोगी हो सकती है।

संविधान की कसौटी पर AI शासन

AI आधारित निर्णयों की चर्चा में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का विशेष महत्व है।

अनुच्छेद 14 समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर स्वचालित निर्णय अपने आप असंवैधानिक है। AI का इस्तेमाल कई परिस्थितियों में उपयोगी और वैध हो सकता है। लेकिन जहां उसके परिणाम किसी व्यक्ति के अधिकारों, स्वतंत्रता या सरकारी लाभों को प्रभावित करते हैं, वहां निष्पक्षता, वैधानिक आधार, उचित प्रक्रिया और प्रभावी शिकायत निवारण का महत्व बढ़ जाता है।

डॉ. त्यागी के शोधपत्र में संदर्भित अमेरिका का Loomis मामला, नीदरलैंड्स की SyRI प्रणाली, ब्रिटेन का Bridges मामला और भारत का पुट्टस्वामी फैसला इस व्यापक अंतरराष्ट्रीय बहस के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाते हैं। ये उदाहरण एक जैसे नहीं हैं, लेकिन इनसे यह समझने में मदद मिलती है कि तकनीक का इस्तेमाल करते समय जोखिम मूल्यांकन, पारदर्शिता, निजता और कानूनी जवाबदेही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दुनिया के सामने रखे गए सात सिद्धांतों का वास्तविक अर्थ

डॉ. त्यागी की प्रस्तुति में भारतीय परंपरा से जोड़े गए सात सिद्धांतों को आधुनिक शासन की भाषा में देखें तो उनका केंद्र नागरिकों के प्रति उत्तरदायित्व है।

  • राजधर्म: तकनीक का इस्तेमाल करने वाला सार्वजनिक प्राधिकरण जवाबदेह रहे।
  • योगक्षेम: AI से जनकल्याण बढ़े और पात्र नागरिक सुविधाओं से वंचित न हों।
  • दंडनीति: जोखिम के अनुमान को बिना पर्याप्त आधार के दंडात्मक कार्रवाई में न बदला जाए।
  • सत्य: महत्वपूर्ण निर्णयों के आधार और डेटा की विश्वसनीयता की जांच हो।
  • विवेक: संवेदनशील मामलों में मानवीय समीक्षा और स्वतंत्र निर्णय की गुंजाइश बनी रहे।
  • सार्वजनिक उत्तरदायित्व: नागरिकों को सूचना, शिकायत और सुधार के प्रभावी रास्ते मिलें।
  • अहिंसा: तकनीकी व्यवस्था से होने वाले अन्यायपूर्ण नुकसान और भेदभाव को रोकने के उपाय हों।

इन सिद्धांतों की उपयोगिता तभी होगी, जब इन्हें नीतियों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और जवाबदेही की ठोस व्यवस्थाओं में बदला जाए। केवल नैतिक घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं; इनके साथ स्वतंत्र ऑडिट, शिकायत निवारण, निर्णयों की समीक्षा और जिम्मेदारी तय करने की स्पष्ट प्रक्रिया भी चाहिए।

AI शासन के लिए तीन जरूरी कदम

डॉ. त्यागी ने AI के उपयोग और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए तीन प्रमुख सुझाव सामने रखे।

1. अधिकारों पर प्रभाव का पूर्व आकलन: संवेदनशील क्षेत्रों में AI प्रणाली लागू करने से पहले यह जांचा जाए कि उससे भेदभाव, निजता के उल्लंघन या नागरिकों को सुविधाओं से वंचित किए जाने का जोखिम तो नहीं है।

2. मानवीय समीक्षा और प्रभावी अपील: जिन स्वचालित निर्णयों से नागरिकों के महत्वपूर्ण हित प्रभावित होते हैं, उनके लिए कारण जानने, गलती सुधारने और सक्षम अधिकारी से समीक्षा मांगने की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। इसकी कानूनी सीमा और प्रक्रिया संबंधित कानून के अनुरूप निर्धारित की जानी चाहिए।

3. वैश्विक AI नीतियों में नैतिक और सांस्कृतिक विविधता: UNESCO, OECD और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर AI शासन की नीतियों में विभिन्न ज्ञान परंपराओं के योगदान पर विचार किया जाए। भारतीय दर्शन के कर्तव्य, न्याय और लोककल्याण संबंधी विचार इस विमर्श में एक उपयोगी बौद्धिक योगदान दे सकते हैं।

इन प्रस्तावों का वास्तविक मूल्य इस बात से तय होगा कि वे नीति निर्माण में किस हद तक जगह पाते हैं और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कितने प्रभावी उपायों में बदलते हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक प्रासंगिकता का सवाल

ब्राजील के अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय न्याय-दर्शन और राजधर्म के सिद्धांतों को AI शासन से जोड़ना एक महत्वपूर्ण बौद्धिक प्रयास है। इसका महत्व केवल भारतीय परंपरा का उल्लेख किए जाने में नहीं, बल्कि इस संभावना में है कि प्राचीन विचार आधुनिक समस्याओं पर नए सवाल उठाने और उनके समाधान की दिशा खोजने में मदद कर सकते हैं।

लेकिन किसी विचार की वैश्विक प्रासंगिकता केवल उसके प्रस्तुत किए जाने से सिद्ध नहीं होती। उसकी वास्तविक परीक्षा इस बात में होती है कि वह अंतरराष्ट्रीय नीति, कानून, शिक्षा और प्रशासन की बहस में कितना उपयोगी साबित होता है। इसलिए इस प्रस्तुति को भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक के बीच संवाद की दिशा में एक प्रयास के रूप में देखना अधिक संतुलित होगा।

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के विधि अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष डॉ. विवेक कुमार त्यागी का यह विषय ऐसे दौर में सामने आया है, जब AI की क्षमता तेजी से बढ़ रही है और उसके नियमन को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस जारी है।

निष्कर्ष: भविष्य केवल बुद्धिमान मशीनों का नहीं, जवाबदेह व्यवस्था का भी होना चाहिए

AI के विकास से प्रशासन अधिक सक्षम, तेज और प्रभावी हो सकता है। लेकिन उसकी सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वह कितनी जल्दी किसी व्यक्ति के बारे में निष्कर्ष निकालता है। यह भी देखना होगा कि उसके निष्कर्ष कितने विश्वसनीय हैं, उनके कारण समझे जा सकते हैं या नहीं, उनसे प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है या नहीं और गलती होने पर जिम्मेदारी कौन उठाता है।

यही वह बिंदु है जहां तकनीकी दक्षता, मानवीय विवेक और संवैधानिक मूल्यों का मेल जरूरी हो जाता है।

मशीन गणना कर सकती है, अनुमान दे सकती है और निर्णय प्रक्रिया को सहायता दे सकती है; लेकिन न्यायपूर्ण शासन के लिए प्रमाण, निष्पक्षता, जवाबदेही और मानवीय गरिमा की रक्षा भी अनिवार्य है।

डॉ. विवेक कुमार त्यागी की प्रस्तुति का केंद्रीय संदेश इसी विचार में निहित है कि तकनीक को मनुष्य के अधिकारों की रक्षा के लिए विकसित किया जाना चाहिए, न कि मनुष्य को तकनीक के निष्कर्षों के सामने विवश करने के लिए।

“यतो धर्मस्ततो जयः”—यह सूत्र इस विमर्श को एक नैतिक दिशा देता है। आधुनिक शासन के संदर्भ में इसका सार यही है कि वास्तविक प्रगति वही है, जिसमें तकनीकी शक्ति के साथ न्याय और उत्तरदायित्व भी मजबूत हों।

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