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एक गोली में कई दवाएं… इलाज आसान या सेहत पर बड़ा खतरा? जानिए पूरा सच

एक गोली में कई दवाएं… वरदान या खतरा? फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन पर क्यों बढ़ रही है चिंता

रिपोर्ट: डॉ. प्रियंका सौरभ

क्या एक ही गोली में कई दवाएं लेना इलाज को आसान बनाता है, या यह मरीजों के लिए नया खतरा बन सकता है? यही सवाल आज पूरी दुनिया में फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन (Fixed Dose Drug Combination-FDC) को लेकर उठ रहा है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में एफडीसी ने इलाज को सरल और प्रभावी बनाया है, लेकिन इसके अनियंत्रित और अतार्किक इस्तेमाल ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता भी बढ़ा दी है।

आखिर क्या है फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन?

एफडीसी ऐसी दवा होती है, जिसमें दो या दो से अधिक सक्रिय औषधीय तत्व एक निश्चित अनुपात में मिलाकर एक ही टैबलेट, कैप्सूल, सिरप या इंजेक्शन के रूप में दिए जाते हैं। इसका उद्देश्य मरीज को कई अलग-अलग दवाओं के बजाय एक ही दवा देकर इलाज को आसान बनाना है।

आज उच्च रक्तचाप, मधुमेह, टीबी, एचआईवी, हृदय रोग, अस्थमा और कई संक्रमणों के उपचार में एफडीसी का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।

क्यों बढ़ रही है इसकी लोकप्रियता?

विशेषज्ञों के अनुसार एफडीसी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मरीज को कई गोलियां नहीं खानी पड़तीं। इससे दवा भूलने की संभावना कम होती है और इलाज बीच में छोड़ने का खतरा भी घट जाता है।

विशेष रूप से टीबी और एचआईवी जैसे रोगों में, जहां लंबे समय तक नियमित दवा लेना जरूरी होता है, एफडीसी काफी प्रभावी साबित हुई है।

दवा प्रतिरोध रोकने में भी मददगार

एंटीबायोटिक दवाओं के गलत इस्तेमाल से दुनिया भर में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ रहा है। यदि मरीज एक दवा छोड़ दे तो संक्रमण पैदा करने वाले जीवाणु मजबूत हो सकते हैं।

एफडीसी में सभी जरूरी दवाएं एक साथ होने के कारण मरीज किसी एक दवा को छोड़ नहीं पाता, जिससे दवा प्रतिरोध का खतरा कम हो सकता है।

आर्थिक रूप से भी फायदेमंद

एफडीसी के कारण दवाओं की पैकेजिंग, भंडारण और वितरण आसान हो जाता है। सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में भी इनका उपयोग लागत कम करने और दवा आपूर्ति को बेहतर बनाने में मदद करता है।

लेकिन यहीं से शुरू होती है चिंता

एफडीसी के फायदे जितने बड़े हैं, उससे जुड़े जोखिम भी कम नहीं हैं।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि हर मरीज की जरूरत अलग होती है, जबकि एफडीसी में दवाओं की मात्रा पहले से तय रहती है। ऐसे में डॉक्टर किसी एक दवा की मात्रा कम या ज्यादा नहीं कर पाते।

इसके अलावा यदि मरीज को एलर्जी या कोई दुष्प्रभाव हो जाए तो यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि समस्या किस दवा के कारण हुई।

भारत में क्यों उठे सवाल?

भारत दुनिया के सबसे बड़े दवा उत्पादक देशों में शामिल है और यहां हजारों एफडीसी बाजार में उपलब्ध हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से कई वैज्ञानिक रूप से उचित हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी संयोजन रहे हैं जिनका कोई ठोस चिकित्सकीय आधार नहीं था। इन्हीं कारणों से केंद्र सरकार समय-समय पर कई अतार्किक एफडीसी पर प्रतिबंध भी लगा चुकी है।

कब मानी जाती है सही एफडीसी?

किसी एफडीसी को तभी तर्कसंगत माना जाता है जब—

  • प्रत्येक दवा की स्पष्ट भूमिका हो।
  • सभी दवाएं एक-दूसरे की प्रभावशीलता बढ़ाएं।
  • सुरक्षा और प्रभावशीलता वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो।
  • संयुक्त दवा अलग-अलग दवाओं की तुलना में अधिक लाभ पहुंचाए।

यदि ये शर्तें पूरी नहीं होतीं तो ऐसी एफडीसी मरीजों के लिए जोखिम बन सकती है।

आगे क्या होना चाहिए?

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में एफडीसी के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगाने की जरूरत नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक और पारदर्शी नियमन की आवश्यकता है।

  • दवा स्वीकृति प्रक्रिया को और मजबूत बनाया जाए।
  • चिकित्सकों को तर्कसंगत दवा उपयोग का प्रशिक्षण दिया जाए।
  • मरीज बिना डॉक्टर की सलाह के कॉम्बिनेशन दवाएं न लें।
  • दवाओं के दुष्प्रभावों की निगरानी (फार्माकोविजिलेंस) को और प्रभावी बनाया जाए।

निष्कर्ष

फिक्स्ड डोज ड्रग कॉम्बिनेशन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि है। सही परिस्थितियों में यह इलाज को आसान, प्रभावी और किफायती बनाती है। लेकिन यदि वैज्ञानिक आधार के बिना इनका उपयोग किया जाए तो यही दवाएं मरीजों और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरा बन सकती हैं।

इसलिए जरूरत एफडीसी के विरोध की नहीं, बल्कि तर्कसंगत, सुरक्षित और वैज्ञानिक उपयोग की है। तभी यह चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धि बनकर समाज के लिए वास्तविक लाभ का माध्यम साबित होगी।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

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