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“कोचिंग इंडस्ट्री का सच: सफलता का सपना या करोड़ों का कारोबार?”

“कोचिंग इंडस्ट्री का सच: सफलता का सपना या करोड़ों का कारोबार?”

यूट्यूब, इंस्टाग्राम और विज्ञापनों की चमक के बीच क्या खो रही है असली शिक्षा? डॉ. प्रियंका सौरभ का बड़ा सवाल
रिपोर्ट | विशेष विश्लेषण
संपादन : अवनीश त्यागी

भारत में शिक्षा को हमेशा राष्ट्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास और सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना गया है। लेकिन बदलते समय के साथ शिक्षा का स्वरूप भी तेजी से बदला है। आज देश में शिक्षा के समानांतर एक ऐसी व्यवस्था खड़ी हो चुकी है, जिसने करोड़ों रुपये के उद्योग का रूप ले लिया है। यह व्यवस्था है—कोचिंग संस्कृति।

एक समय था जब विद्यार्थी की सफलता का आधार विद्यालय और शिक्षक हुआ करते थे। आज स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में अभिभावक मानने लगे हैं कि बिना कोचिंग के किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता संभव नहीं है। यही सोच धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

शिक्षा नहीं, अब बिक रहे हैं ब्रांड!

हाल के वर्षों में यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने शिक्षा जगत में एक नया ट्रेंड पैदा किया है। अनेक शिक्षक अब केवल शिक्षक नहीं रह गए हैं, बल्कि वे स्वयं एक ब्रांड बन चुके हैं। उनके वीडियो करोड़ों व्यूज हासिल करते हैं, बड़े-बड़े विज्ञापन अभियान चलते हैं और सोशल मीडिया पर उनकी लोकप्रियता किसी फिल्मी सितारे से कम नहीं दिखाई देती।

शिक्षा विशेषज्ञ और सामाजिक चिंतक डॉ. प्रियंका सौरभ का मानना है कि तकनीक का उपयोग शिक्षा के विस्तार के लिए सकारात्मक है, लेकिन जब शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान प्रदान करने के बजाय प्रचार, व्यक्तिगत ब्रांडिंग और व्यावसायिक विस्तार बन जाए, तब गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

अंजना ओम कश्यप की टिप्पणी ने क्यों छेड़ी नई बहस?

हाल ही में एक टीवी डिबेट में एक चर्चित यूट्यूबर शिक्षक को लेकर वरिष्ठ पत्रकार द्वारा की गई टिप्पणी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई। इस विवाद ने देशभर में एक बड़ी बहस को जन्म दिया—क्या शिक्षा अब व्यवसाय और प्रचार का माध्यम बनती जा रही है?

बहस किसी व्यक्ति विशेष की नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या कोचिंग संस्थानों ने सफलता को एक उत्पाद बनाकर बाजार में उतार दिया है?

सफलता का सपना, परिवारों पर आर्थिक बोझ

देश के कोटा, प्रयागराज, दिल्ली, पटना, लखनऊ और अन्य बड़े कोचिंग केंद्र हर साल लाखों विद्यार्थियों को आकर्षित करते हैं। इनमें से हजारों परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा कोचिंग फीस, हॉस्टल, किताबों और अन्य खर्चों पर खर्च कर देते हैं।

ग्रामीण और छोटे शहरों से आने वाले विद्यार्थी बेहतर अवसरों की तलाश में घर छोड़ते हैं। लेकिन इस दौड़ का दूसरा पहलू मानसिक तनाव, अवसाद, सामाजिक अलगाव और बढ़ता दबाव भी है।

क्या स्कूल की पढ़ाई पर्याप्त नहीं?

कोचिंग संस्कृति के विस्तार के पीछे शिक्षा व्यवस्था की कुछ वास्तविक कमियां भी हैं। कई प्रतियोगी परीक्षाओं का पैटर्न विद्यालयी पाठ्यक्रम से अलग होता है। परीक्षा-विशिष्ट रणनीति, समय प्रबंधन और विशेष तैयारी की आवश्यकता विद्यार्थियों को कोचिंग की ओर धकेलती है।

यही वह खाली जगह है, जहां कोचिंग उद्योग खुद को सफलता की अनिवार्य कुंजी के रूप में स्थापित कर देता है।

सोशल मीडिया की दुनिया में ‘स्टार टीचर’ का उदय

आज कई शिक्षक अपने विषय से अधिक अपनी लोकप्रियता के कारण पहचाने जाते हैं। उनके वीडियो, रील्स, विज्ञापन और सफलता की कहानियां लगातार विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत की जाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस माहौल में सफलता पाने वाले चुनिंदा विद्यार्थियों को प्रमुखता से दिखाया जाता है, जबकि असफल रहने वाले लाखों छात्रों की कहानी सामने नहीं आ पाती। इससे विद्यार्थियों में अवास्तविक अपेक्षाएं पैदा होती हैं।

क्या शिक्षा का केंद्र विद्यार्थी है या शिक्षक का ब्रांड?

विशाल होर्डिंग, बड़े-बड़े विज्ञापन, सोशल मीडिया कैंपेन और व्यक्तिगत छवि निर्माण पर खर्च हो रहे करोड़ों रुपये यह सवाल उठाते हैं कि शिक्षा का केंद्र आखिर कौन है—विद्यार्थी या शिक्षक का ब्रांड?

शिक्षा का उद्देश्य विचार निर्माण होना चाहिए, न कि व्यक्तिपूजा। यदि विद्यार्थी किसी शिक्षक की लोकप्रियता से प्रभावित होकर विषय की गुणवत्ता को नजरअंदाज करने लगें, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है।

समाधान क्या है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि कोचिंग संस्कृति को समाप्त करना समाधान नहीं है, बल्कि विद्यालयी शिक्षा को इतना मजबूत बनाना होगा कि विद्यार्थियों की बुनियादी तैयारी स्कूल स्तर पर ही हो सके।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) इसी दिशा में प्रयास कर रही है, लेकिन इसके प्रभाव को जमीनी स्तर पर दिखने में अभी समय लगेगा। साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं और विद्यालयी पाठ्यक्रम के बीच बेहतर तालमेल भी आवश्यक है।

अभिभावकों और विद्यार्थियों के लिए बड़ा संदेश

अभिभावकों को यह समझना होगा कि कोचिंग सफलता का साधन हो सकती है, लेकिन सफलता की गारंटी नहीं। वहीं विद्यार्थियों को यह स्वीकार करना होगा कि कोई भी शिक्षक या संस्थान उनकी मेहनत का विकल्प नहीं बन सकता।

लोकप्रियता और गुणवत्ता हमेशा एक जैसी नहीं होती। किसी भी संस्थान का चयन विज्ञापनों के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक शैक्षणिक उपयोगिता के आधार पर किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

कोचिंग संस्कृति पर चल रही बहस केवल किसी पत्रकार, शिक्षक या संस्थान तक सीमित नहीं है। यह भारत की शिक्षा व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। यदि शिक्षा ज्ञान, विवेक और चरित्र निर्माण की जगह केवल ब्रांडिंग और व्यवसाय का माध्यम बनती गई, तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को उसके मूल उद्देश्य से जोड़ा जाए, विद्यालयों को सशक्त बनाया जाए और विद्यार्थियों में यह विश्वास जगाया जाए कि सफलता का सबसे बड़ा आधार किसी कोचिंग संस्थान का नाम नहीं, बल्कि उनकी अपनी मेहनत, अनुशासन और सीखने की क्षमता है।

(लेखिका: डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक)

प्रस्तुति: Target TV Live

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