“सत्ता की नहीं, सच की आवाज बने पत्रकार” : हिंदी पत्रकारिता दिवस पर गूंजी पथिक और डॉ. मुस्तकीम की विरासत
अमरोहा में हिंदी पत्रकारिता दिवस पर चिंतन, वक्ताओं ने कहा- पत्रकारिता मिशन है, व्यवसाय नहीं; सच और समाज के लिए चलनी चाहिए कलम
एम पी सिंह | TargetTvLive
अमरोहा। एक ओर सोशल मीडिया पर सूचनाओं की बाढ़ है, दूसरी ओर सच की तलाश पहले से अधिक कठिन होती जा रही है। ऐसे दौर में हिंदी पत्रकारिता दिवस पर अमरोहा में आयोजित कार्यक्रम ने पत्रकारिता के मूल उद्देश्य और उसकी सामाजिक जिम्मेदारी को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी। कार्यक्रम में वक्ताओं ने साफ कहा कि पत्रकारिता का धर्म सत्ता के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि सच और समाज के साथ खड़ा होना है।
हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार महिपाल सिंह ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी समावेशी सोच है और यही समावेशिता पत्रकारिता को भी जीवित रखेगी। उन्होंने कहा कि भले ही आज एकपक्षीय सोच समाज और मीडिया दोनों पर हावी होती दिखाई दे रही हो, लेकिन भारतीय पत्रकारिता की आत्मा हमेशा विविध विचारों, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों में रही है।
उदन्त मार्तण्ड से शुरू हुआ था जनजागरण का सफर
महिपाल सिंह ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह उस ऐतिहासिक विरासत को याद करने का अवसर है जिसकी शुरुआत 30 मई 1826 को हिंदी के पहले समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ से हुई थी। उस दौर में पत्रकारिता मिशन थी और आज भी उसकी असली पहचान मिशन ही होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पत्रकार का दायित्व केवल खबरें देना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करना और व्यवस्था की कमियों को सामने लाना भी है।
विजय सिंह पथिक: जिन्होंने कलम को बना दिया जनसंघर्ष का हथियार
कार्यक्रम में स्वतंत्रता सेनानी, किसान नेता और पत्रकारिता के महान योद्धा विजय सिंह पथिक को विशेष रूप से याद किया गया।
वक्ताओं ने कहा कि पथिक जी ने ‘राजस्थान केसरी’ और ‘नवीन राजस्थान’ जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत और अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं के खिलाफ जनमत तैयार किया। उन्होंने पत्रकारिता को सत्ता के दरबार से निकालकर आम जनता के बीच पहुंचाया।
उनकी लेखनी में ऐसा साहस था जिसने किसान आंदोलनों को नई दिशा दी और पत्रकारिता को संघर्ष तथा सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया।
डॉ. मुस्तकीम: खबरों में समाज की धड़कन तलाशने वाले पत्रकार
कार्यक्रम में प्रख्यात पत्रकार और समाज विज्ञानी डॉ. मुस्तकीम को भी भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।
वक्ताओं ने कहा कि डॉ. मुस्तकीम केवल समाचार लिखने वाले पत्रकार नहीं थे, बल्कि वे समाज को गहराई से समझने वाले चिंतक थे। उन्होंने हर खबर को सामाजिक दृष्टि से परखा और पत्रकारिता को जनहित से जोड़ने का कार्य किया।
प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) में रहते हुए उनकी निष्पक्षता, अध्ययनशीलता और वैचारिक गंभीरता ने उन्हें पत्रकारिता जगत में एक अलग पहचान दिलाई। आज भी उनका कार्य युवा पत्रकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
सोशल मीडिया बना चुनौती, पत्रकारिता के सामने बड़ा संकट
कार्यक्रम में वक्ताओं ने चिंता जताई कि सोशल मीडिया ने सूचना का लोकतंत्रीकरण तो किया है, लेकिन इसके साथ ही अफवाहों, आधी-अधूरी जानकारियों और वैचारिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा मिला है।
आज हर व्यक्ति सूचना प्रसारित कर सकता है, लेकिन तथ्य और सत्य की जांच करने वाले पत्रकारों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। वक्ताओं ने कहा कि सोशल मीडिया के शोर में पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
पत्रकारिता की शुचिता बचाने का लिया संकल्प
वक्ताओं ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल मूल्यों की ओर लौटे। निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, संवेदनशीलता और लोकहित पत्रकारिता की पहचान बनें।
कार्यक्रम में उपस्थित पत्रकारों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने संकल्प लिया कि वे पत्रकारिता को जनहित, लोकतंत्र और सामाजिक सरोकारों से जोड़े रखने के लिए निरंतर प्रयास करेंगे।
इन वक्ताओं ने रखे विचार
कार्यक्रम को डॉ. महताब अमरोहवी, डॉ. महेंद्र सिंह मौर्य, नरेश सिंह सागर, विनीत अग्रवाल, इमरान अहमद अंसारी, मनोज कुमार, आनंद चौहान, सतपाल सिंह मान तथा इकबाल हैदर नवाब सिद्दीकी सहित अनेक वक्ताओं ने संबोधित किया।
निष्कर्ष: पत्रकारिता बचेगी तो लोकतंत्र बचेगा
अमरोहा में आयोजित यह कार्यक्रम केवल श्रद्धांजलि सभा नहीं था, बल्कि पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य पर गंभीर चिंतन का मंच भी बना। वक्ताओं का मानना था कि यदि पत्रकारिता सच, निष्पक्षता और जनहित से भटक गई तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो जाएगी।
विजय सिंह पथिक का साहस और डॉ. मुस्तकीम की बौद्धिक ईमानदारी आज भी पत्रकारिता के लिए मार्गदर्शक हैं। हिंदी पत्रकारिता के 200वें वर्ष में प्रवेश पर यही संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है कि पत्रकारिता का असली धर्म सत्ता नहीं, बल्कि सच और समाज है।
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