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गरीबी, बेगार और अपमान… मिड-डे मील रसोइयों की दर्दभरी कहानी वायरल

2 हजार की तनख्वाह में कैसे जिएं? 5 महीने से भूखी बैठीं यूपी की रसोइयां, सरकार से बोलीं – “अब न्याय चाहिए”

बिजनौर में फूटा रसोइयों का गुस्सा, मुख्यमंत्री के नाम भेजा ज्ञापन… 26 हजार वेतन, स्थायी नौकरी और सम्मान की उठी मांग
बिजनौर | TargetTvLive | अवनीश त्यागी

उत्तर प्रदेश के स्कूलों में बच्चों का पेट भरने वाली रसोइयां आज खुद आर्थिक तंगी और सरकारी उपेक्षा की मार झेल रही हैं। बिजनौर में “प्रगतिशील रसोइया संगठन” के बैनर तले महिलाओं का दर्द उस वक्त खुलकर सामने आया, जब उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम जिलाधिकारी को एक तीखा ज्ञापन सौंपते हुए कहा — “हमसे मजदूरों से ज्यादा काम लिया जाता है, लेकिन बदले में सम्मान तो दूर, समय पर मानदेय तक नहीं मिलता।”

रसोइयों का आरोप है कि पिछले पांच महीनों से मानदेय नहीं मिला, जबकि महंगाई लगातार आसमान छू रही है। हालत यह है कि जिन महिलाओं के हाथों से लाखों बच्चों का मिड-डे मील तैयार होता है, उन्हीं के घरों में चूल्हा जलाना मुश्किल हो गया है।

“क्या 2 हजार रुपये में घर चल सकता है?”

रसोइयों ने सरकार से पूछा बड़ा सवाल

ज्ञापन में रसोइयों ने साफ कहा कि उत्तर प्रदेश में उन्हें बेहद कम मानदेय दिया जा रहा है। कई महिलाएं 15 से 20 साल से स्कूलों में सेवा दे रही हैं, लेकिन आज तक न तो उन्हें स्थायी किया गया और न ही सरकारी कर्मचारी जैसी सुविधाएं मिलीं।

रसोइयों का कहना है कि उनसे सिर्फ खाना ही नहीं बनवाया जाता, बल्कि स्कूलों में साफ-सफाई, बर्तन धुलवाने और अन्य कार्य भी कराए जाते हैं। इसके बावजूद उन्हें महज लगभग 2 हजार रुपये देकर “मानदेय” का नाम दिया जाता है।

महिलाओं ने सवाल उठाया —
“जब दूसरे राज्यों में रसोइयों को हजारों रुपये वेतन मिल सकता है, तो यूपी में क्यों नहीं?”

हाईकोर्ट के फैसले का हवाला, बोलीं – “हमसे बेगार कराई जा रही”

प्रगतिशील रसोइया संगठन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत भी कम मानदेय पर काम कराने को “बेगार” मान चुकी है।

रसोइयों ने मांग की कि सरकार उन्हें न्यूनतम 26 हजार रुपये मासिक वेतन दे और सभी को स्थायी कर्मचारी घोषित करे।

संगठन का कहना है कि सरकार बच्चों के पोषण की बात तो करती है, लेकिन उन्हीं बच्चों का भोजन तैयार करने वाली महिलाओं की जिंदगी बदहाल बनी हुई है।

“हर साल फार्म भरवाकर किया जाता है अपमान”

ज्ञापन में सबसे बड़ा आरोप ग्राम प्रधानों और स्कूल प्रशासन की मनमानी पर लगाया गया।

रसोइयों का कहना है कि हर साल नवीनीकरण के नाम पर फार्म भरवाए जाते हैं और कई बार वर्षों से काम कर रहीं महिलाओं को हटाकर दूसरी नियुक्तियां कर दी जाती हैं। इससे गरीब महिलाओं के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है।

महिलाओं ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया मानसिक और आर्थिक शोषण का जरिया बन चुकी है।

आंगनबाड़ी का खाना भी बनवाया, पैसा नहीं दिया!

रसोइयों ने दावा किया कि कई जगह आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों का भोजन भी उन्हीं से बनवाया जाता है, लेकिन उसका भुगतान नहीं किया जाता।

इसके अलावा बड़ी संख्या में रसोइयों के पास राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड और बीमा जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं।

रसोइयों की प्रमुख मांगें

  • पांच माह का रुका हुआ मानदेय तुरंत जारी किया जाए
  • सभी रसोइयों को स्थायी कर्मचारी बनाया जाए
  • न्यूनतम 26 हजार रुपये वेतन लागू हो
  • ईएसआई, पीएफ, प्रसूति अवकाश और वार्षिक अवकाश मिले
  • स्कूलों में उत्पीड़न और मनमानी पर रोक लगे
  • राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड और बीमा सुविधा दी जाए
  • आंगनबाड़ी भोजन का भुगतान सीधे रसोइयों को मिले

क्या सरकार सुनेगी “मिड-डे मील की माओं” की आवाज?

बिजनौर से उठी यह आवाज अब पूरे उत्तर प्रदेश में बड़ा मुद्दा बन सकती है। हजारों महिलाएं वर्षों से इस व्यवस्था का हिस्सा हैं, लेकिन उनका दर्द लगातार अनसुना किया जाता रहा है।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि पंचायत चुनावों और बढ़ते सामाजिक असंतोष के बीच रसोइयों की नाराजगी सरकार के लिए नई मुश्किल खड़ी कर सकती है।

TargetTvLive Analysis

मिड-डे मील योजना को बच्चों के पोषण और शिक्षा से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस योजना की रीढ़ बनी रसोइयां खुद असुरक्षा और आर्थिक संकट में जी रही हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार उन महिलाओं को सम्मान और अधिकार दे पाएगी, जिनके भरोसे करोड़ों बच्चों का भोजन तैयार होता है?

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