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कटते जंगलों की दर्दनाक चीख: इंसान खुद लिख रहा अपनी तबाही की कहानी

कटते जंगलों की दर्दनाक चीख: इंसान खुद लिख रहा अपनी तबाही की कहानी

प्रकृति के दर्द को आवाज देती डॉ. प्रियंका सौरभ की कविता ने खड़े किए बड़े सवाल
लेखक: अवनीश त्यागी | TargetTvLive

आज पूरी दुनिया भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़, प्रदूषण और जल संकट जैसी समस्याओं से जूझ रही है। मौसम का बिगड़ता मिजाज साफ बता रहा है कि प्रकृति अब इंसानी लालच का बोझ सहन नहीं कर पा रही। ऐसे समय में साहित्यकार डॉ. प्रियंका सौरभ की कविता “कटते जंगल रो रहे, काँपे सब जज़्बात” समाज को झकझोरने का काम कर रही है।

यह कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि धरती की पीड़ा, जंगलों की चीख और आने वाले भयावह भविष्य की चेतावनी है। कविता की हर पंक्ति इंसान से सवाल करती है कि आखिर विकास के नाम पर वह कब तक प्रकृति का विनाश करता रहेगा?

जंगल कटे तो जीवन भी बचेगा नहीं

कविता में पेड़ों को धरती की छांव और जीवन का आधार बताया गया है। सच भी यही है कि जंगल केवल हरियाली नहीं देते, बल्कि बारिश, शुद्ध हवा, जल संरक्षण और जीव-जंतुओं के अस्तित्व का सबसे बड़ा सहारा हैं।

लेकिन दुखद स्थिति यह है कि आज शहरों के विस्तार, फैक्ट्रियों और सड़कों के नाम पर लगातार पेड़ों की कटाई हो रही है। जंगल खत्म हो रहे हैं और उनकी जगह कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं। इसका सीधा असर मौसम पर दिखाई दे रहा है।

कहीं रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है तो कहीं अचानक बाढ़ तबाही मचा रही है। भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है और हवा जहरीली होती जा रही है।

पक्षियों का घर उजड़ रहा, इंसान फिर भी खामोश

कविता की पंक्ति—

“पेड़ों की हर डाल पर, चिड़ियों का परिवार…”

सीधे उस दर्द को बयान करती है जिसे अक्सर इंसान नजरअंदाज कर देता है। एक पेड़ कटता है तो केवल लकड़ी नहीं गिरती, बल्कि कई पक्षियों का घर उजड़ जाता है। हजारों जीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है।

आज गांवों और शहरों में पहले जैसी चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई नहीं देती। इसका सबसे बड़ा कारण पेड़ों की अंधाधुंध कटाई है। पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में कई प्रजातियां हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं।

विकास की अंधी दौड़ ने छीना प्रकृति का संतुलन

कविता इंसान की स्वार्थी सोच पर भी करारा प्रहार करती है।

“जिस थाली में खा रहा, उसको मारे लात…”

यह पंक्ति बताती है कि इंसान उसी प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहा है, जो उसे जीवन देती है। पेड़ ही प्राणवायु देते हैं, खेतों को उपजाऊ बनाते हैं और नदियों को जीवित रखते हैं। लेकिन बदले में इंसान उन्हें काटकर अपना ही भविष्य खतरे में डाल रहा है।

आज विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति को खत्म कर दे, वह विनाश से कम नहीं।

अब भी नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी

कविता का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अभी भी समय है। यदि समाज जागरूक हो जाए, पेड़ों की रक्षा करे और पर्यावरण संरक्षण को अपनी जिम्मेदारी समझे, तो हालात बदले जा सकते हैं।

सरकारों को केवल कागजों में वृक्षारोपण अभियान चलाने के बजाय जमीन पर सख्ती से जंगल बचाने होंगे। वहीं आम लोगों को भी एक पेड़ लगाने और उसे बचाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।

क्योंकि अगर जंगल खत्म हो गए, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल किताबों और तस्वीरों में हरियाली देखने को मिलेगी।

निष्कर्ष

डॉ. प्रियंका सौरभ की यह कविता आज के समय की सच्चाई को बेहद सरल लेकिन तीखे अंदाज में सामने लाती है। यह कविता केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि समझने और चेतने के लिए है।

प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है कि अब भी संभल जाओ। वरना वह दिन दूर नहीं जब इंसान अपनी ही गलतियों का सबसे बड़ा शिकार बन जाएगा।

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