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“खेती में क्रांति का बिगुल! बिजनौर के किसान सिसौली में सीखेंगे बिना खाद-कीटनाशक ‘कम लागत, दोगुना मुनाफा’ का फॉर्मूला”

“खेती में क्रांति का बिगुल! बिजनौर के किसान सिसौली में सीखेंगे बिना खाद-कीटनाशक ‘कम लागत, दोगुना मुनाफा’ का फॉर्मूला”

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📍नुमाइश ग्राउंड से उठी आवाज—‘अब बदलेगी खेती की तस्वीर’

बिजनौर जिले में खेती को नई दिशा देने की पहल तेज होती नजर आ रही है। भारतीय किसान यूनियन (BKU) के जिला अध्यक्ष सुनील प्रधान के नेतृत्व में बड़ी संख्या में किसान नुमाइश ग्राउंड पर एकत्रित हुए और वहां से सामूहिक रूप से सिसौली के लिए रवाना हुए।

यह यात्रा केवल एक कार्यक्रम में भाग लेने तक सीमित नहीं, बल्कि खेती में बदलाव और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता एक बड़ा आंदोलन बनती दिख रही है।

4 दिन की कृषि गोष्ठी—खेती का नया ‘गेम चेंजर’ मॉडल

सिसौली में 22, 23, 24 और 25 तारीख तक चलने वाली इस विशेष कृषि गोष्ठी में देशभर के किसान भाग लेंगे।

इस दौरान किसानों को बताया जाएगा कि कैसे:

  • बिना रासायनिक खाद
  • बिना कीटनाशक
  • बेहद कम लागत में
  • अधिक और बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है

👉 कार्यक्रम में महाराष्ट्र के प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक सुभाष पालेकर किसानों को जीरो बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) का व्यावहारिक प्रशिक्षण देंगे।

क्या है ‘जीरो बजट प्राकृतिक खेती’? क्यों बन रही किसानों की पहली पसंद?

आज खेती में सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती लागत और घटती आमदनी है। ऐसे में ‘जीरो बजट खेती’ किसानों के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरी है।

 इसकी प्रमुख विशेषताएं:

  •  लागत लगभग शून्य के बराबर
  •  प्राकृतिक तरीकों से उत्पादन
  • रसायनों से पूरी तरह मुक्ति
  •  मिट्टी की उर्वरता में सुधार
  •  स्वास्थ्यवर्धक और जैविक फसल

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मॉडल किसानों को कर्ज के जाल से बाहर निकालने में मदद कर सकता है।

बिजनौर के किसान—अब बदलाव के लिए तैयार

इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जिले के कई प्रमुख किसान उत्साह के साथ सिसौली के लिए रवाना हुए।

👉 प्रमुख रूप से शामिल किसान:
मुकेश जंगघला, अरुण कुमार, विनीत चौधरी, विनीत मौर्य, महावीर सिंह, मुनेंद्र काकरान, अजय बालियां, दिनेश कुमार, गौरव जंगघला, नीतू चौधरी सहित अनेक किसान

इनकी भागीदारी यह दर्शाती है कि अब किसान पारंपरिक खेती से हटकर नई तकनीकों को अपनाने के लिए गंभीर हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट: क्यों जरूरी हो गया है खेती का मॉडल बदलना?

आज का किसान कई चुनौतियों से जूझ रहा है:

  •  लगातार बढ़ती खेती की लागत
  •  उर्वरक और कीटनाशकों पर निर्भरता
  •  मिट्टी की घटती गुणवत्ता
  •  बाजार में अस्थिर कीमतें

👉 ऐसे में ‘जीरो बजट खेती’ एक सस्टेनेबल और लॉन्ग-टर्म समाधान के रूप में उभर रही है।

यदि यह मॉडल बड़े स्तर पर अपनाया गया तो:

  • किसानों की आय में स्थायी वृद्धि संभव
  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण
  • जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग का लाभ
  • गांवों में आर्थिक मजबूती

सिसौली—किसानों के आंदोलन और नवाचार का केंद्र

सिसौली लंबे समय से किसान आंदोलनों और कृषि जागरूकता का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां आयोजित होने वाले ऐसे कार्यक्रम किसानों को न केवल नई तकनीक सिखाते हैं, बल्कि उन्हें एकजुट कर नई दिशा भी देते हैं।

बड़ी बात: क्या सच में दोगुनी हो सकती है किसानों की आय?

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसान:

  • प्राकृतिक खेती अपनाएं
  • स्थानीय संसाधनों का उपयोग करें
  • रसायनों से दूरी बनाएं

तो कम लागत में बेहतर मुनाफा संभव है।

हालांकि, इसके लिए सही प्रशिक्षण और धैर्य बेहद जरूरी है—जो इस गोष्ठी का मुख्य उद्देश्य है।

निष्कर्ष: ‘खेती का भविष्य बदलने की शुरुआत’

बिजनौर से सिसौली तक किसानों की यह यात्रा एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह केवल ज्ञान प्राप्त करने की पहल नहीं, बल्कि खेती को लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

यदि यह प्रयास सफल होता है, तो आने वाले समय में भारतीय कृषि एक नई क्रांति की ओर बढ़ सकती है।

आपकी राय क्या है?
क्या जीरो बजट प्राकृतिक खेती किसानों के लिए गेम चेंजर साबित होगी? अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें और इस खबर को शेयर करें।

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