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शंखनाद से गूंजा लखनऊ, सवर्णों का शक्ति प्रदर्शन, बैरिकेडिंग फांद पुलिस से भिड़े हजारों लोग

लखनऊ में ‘सवर्ण हुंकार’! शंखनाद, बैरिकेडिंग फांद मार्च, पुलिस से टकराव, UGC कानून पर बड़ा बवाल

 

📍लउखनऊ। 21 फ़रवरी 2026डिजिटल डेस्क रिपोर्ट

UGC कानून के खिलाफ सड़कों पर उतरा सवर्ण समाज, पुलिस से टकराव के बाद कई हिरासत में

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ शनिवार को उस समय सियासी और सामाजिक हलचल का केंद्र बन गई, जब सवर्ण मोर्चा के बैनर तले हजारों लोगों ने यूजीसी कानून के विरोध में विशाल शांति मार्च निकाला। परिवर्तन चौक से शुरू हुआ यह मार्च गांधी प्रतिमा हजरतगंज तक जाना था, लेकिन भारी पुलिस बंदोबस्त और बैरिकेडिंग के कारण प्रदर्शनकारियों और उत्तर प्रदेश पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक हो गई।

सैंकड़ों ब्राह्मण बटुकों का शंखनाद बना आंदोलन की पहचान

इस आंदोलन की सबसे खास तस्वीर सैंकड़ों ब्राह्मण बटुकों का सामूहिक शंखनाद रहा, जिसने पूरे माहौल को धार्मिक-सांस्कृतिक रंग दे दिया। शंखध्वनि के साथ तिरंगा और भगवा ध्वज लहराते प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को जोरदार तरीके से उठाया।

मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों ने:

  • यूजीसी कानून वापस लेने
  • सवर्ण आयोग गठन
  • आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने

जैसी प्रमुख मांगें उठाईं।

बैरिकेडिंग फांद आगे बढ़े प्रदर्शनकारी, हलवासिया चौराहे पर टकराव

पुलिस ने प्रदर्शन को रोकने के लिए कई स्थानों पर बैरिकेडिंग लगाई थी, लेकिन हजारों कार्यकर्ता केडी सिंह बाबू मेट्रो स्टेशन के पास बैरिकेडिंग फांदकर हलवासिया चौराहे तक पहुंच गए।

यहां:

  • प्रदर्शनकारी सड़क पर धरने पर बैठ गए
  • जमकर नारेबाजी हुई
  • कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भारी पुलिस बल तैनात रहा।

पुलिस की बड़ी कार्रवाई: सैकड़ों कार्यकर्ता हाउस अरेस्ट

सवर्ण मोर्चा के नेताओं का आरोप है कि आंदोलन को कमजोर करने के लिए प्रदेश भर में सैकड़ों पदाधिकारियों को हाउस अरेस्ट किया गया और नोटिस जारी किए गए।

मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता पंडित अभिनव नाथ त्रिपाठी ने कहा:

“यूजीसी का यह कानून सवर्ण समाज के सम्मान के खिलाफ है। जब तक इसे वापस नहीं लिया जाएगा, आंदोलन जारी रहेगा।”

आंदोलन में कई बड़े संगठन भी हुए शामिल

इस प्रदर्शन में कई प्रभावशाली संगठनों की भागीदारी ने इसे और बड़ा बना दिया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल रहे:

  • राष्ट्रीय राजपूत करनी सेना
  • अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
  • अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा

विश्लेषण: क्या सवर्ण राजनीति का नया उभार है यह आंदोलन?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह आंदोलन केवल एक कानून के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवर्ण समाज के भीतर बढ़ती राजनीतिक असंतोष और प्रतिनिधित्व की मांग का संकेत भी है।

इसके पीछे 3 बड़े संकेत:

1️⃣ आर्थिक आधार पर आरक्षण की बहस तेज होगी

यह मुद्दा लंबे समय से उठता रहा है, लेकिन अब यह सड़क पर खुलकर सामने आ रहा है।

2️⃣ 2027 चुनाव से पहले सामाजिक समीकरण बदल सकते हैं

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सवर्ण वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता रहा है।

3️⃣ सरकार पर दबाव की रणनीति

बड़े पैमाने पर प्रदर्शन सरकार को बातचीत या स्पष्टीकरण के लिए मजबूर कर सकते हैं।

प्रशासन के सामने चुनौती

इस घटना ने प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है:

  • कानून-व्यवस्था बनाए रखना
  • सामाजिक असंतोष को संभालना

निष्कर्ष: आने वाले समय में और तेज हो सकता है आंदोलन

लखनऊ में हुआ यह प्रदर्शन संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। यदि सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच संवाद नहीं हुआ, तो यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति का बड़ा केंद्र बन सकता है।

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