अमरोहा में ‘जहरीला पानी’ बना जंग का कारण: 63 दिन से धरने पर किसान, पीएम मोदी के मेरठ दौरे से जगी उम्मीद

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📍 अमरोहा, 21 फरवरी | M.P. singh विशेष रिपोर्ट
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के गजरौला क्षेत्र में दूषित भूजल अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि किसानों के अस्तित्व और आजीविका की लड़ाई बन चुका है। पिछले दो महीनों से नाईपुरा इलाके में जहरीले पानी को लेकर किसानों का आक्रोश लगातार उग्र होता जा रहा है। पीने का पानी पीला, बदबूदार और संभावित रूप से खतरनाक हो चुका है, जबकि आरोप है कि रासायनिक फैक्ट्रियों के अपशिष्ट ने पूरे भूजल तंत्र को जहर में बदल दिया है।
जहर बना पानी, प्रशासन पर ‘खामोशी’ का आरोप
स्थानीय किसानों का कहना है कि कई बार शिकायतों के बावजूद प्रशासन की कार्रवाई केवल जांच तक सीमित है। जमीनी स्तर पर सुधार नहीं दिख रहा। किसानों का दर्द साफ झलकता है—उनका कहना है कि प्रशासन के सामने शिकायत करना “भैंस के आगे बीन बजाने” जैसा हो गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भूजल प्रदूषण का यह मामला यदि समय रहते नहीं सुलझा, तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र गंभीर स्वास्थ्य और कृषि संकट का केंद्र बन सकता है।
63 दिन से धरने पर किसान, युवा बने आंदोलन की ताकत
भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) के बैनर तले शहबाजपुर डोर में किसानों का अनिश्चितकालीन धरना शनिवार को 63वें दिन में प्रवेश कर गया।
ट्रैक्टर-ट्रालियों में पहुंचे युवा किसानों ने नारेबाजी करते हुए स्पष्ट संदेश दिया:
- दूषित जल से मुक्ति चाहिए
- जंगल, जमीन और जल की सुरक्षा चाहिए
- किसानों के अस्तित्व से खिलवाड़ बंद होना चाहिए
यह आंदोलन अब स्थानीय समस्या से आगे बढ़कर क्षेत्रीय किसान असंतोष का प्रतीक बनता जा रहा है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता बना नया विवाद
धरने के दौरान प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर भी किसानों ने गंभीर चिंता जताई।
भाकियू नेता नरेश चौधरी ने चेतावनी दी:
“अमेरिका के भारी सब्सिडी वाले किसान और भारत के छोटे किसान बराबरी की प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। यह समझौता कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ देगा।”
नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्रियों चौधरी चरण सिंह और मनमोहन सिंह का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने किसानों के हितों को ध्यान में रखकर बाजार नीति बनाई थी।
इको-एंजायटी और सामाजिक संकट का खतरा
भाकियू के अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एहसान अली ने गंभीर सामाजिक चेतावनी दी:
- दूषित जल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर
- रोजगार के अवसर घट रहे
- बीमारियां और बेरोजगारी बढ़ रही
- युवाओं में “इको-एंजायटी” बढ़ रही
यह केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता का भी मुद्दा बन चुका है।
पीएम मोदी के मेरठ दौरे से जगी उम्मीद
किसानों की निगाहें अब 22 फरवरी पर टिकी हैं, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेरठ दौरा प्रस्तावित है।
किसानों को उम्मीद है कि:
- दूषित जल संकट पर ठोस निर्णय होगा
- औद्योगिक प्रदूषण पर सख्त कार्रवाई होगी
- पश्चिमी यूपी के किसानों को राहत मिलेगी
विश्लेषण: यह आंदोलन क्यों है बेहद महत्वपूर्ण?
1️⃣ पर्यावरण बनाम उद्योग की टकराहट
गजरौला औद्योगिक हब है। लेकिन उद्योगों की कीमत किसानों और ग्रामीणों को चुकानी पड़ रही है।
2️⃣ जल संकट = कृषि संकट
भूजल खराब होने का सीधा असर:
- फसल उत्पादन
- पशुपालन
- मानव स्वास्थ्य
पर पड़ेगा।
3️⃣ व्यापार समझौते ने बढ़ाई चिंता
वैश्विक प्रतिस्पर्धा के डर ने स्थानीय संकट को राष्ट्रीय मुद्दे से जोड़ दिया है।
4️⃣ राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय
प्रधानमंत्री के दौरे से पहले आंदोलन का तेज होना सरकार पर दबाव बढ़ा सकता है।
धरना स्थल पर मौजूद प्रमुख किसान
शानू चौधरी, होमपाल सिंह, गंगाराम सिंह, मंसूर अली, विजय सिंह, सुरेश चंद्र, रामचंद्र सिंह, समरपाल सिंह, सुखा खान, बाबुद्दीन, चंद्रपाल सिंह, बाबू अली, शमशाद चौधरी, रामफल सिंह, देवेंद्र सिंह, ओम प्रकाश सिंह, रामप्रसाद सिंह, पृथ्वी सिंह सहित सैकड़ों किसान मौजूद रहे।
निष्कर्ष: पानी का संकट बना किसानों की अस्मिता की लड़ाई
अमरोहा का यह आंदोलन केवल दूषित पानी का विरोध नहीं है, बल्कि यह सवाल है—
- किसानों के अस्तित्व का
- पर्यावरण न्याय का
- और विकास मॉडल की प्राथमिकताओं का
अब देखना होगा कि सरकार जांच से आगे बढ़कर समाधान देती है या यह आंदोलन और बड़ा रूप लेता है।
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