केंद्रीय बजट 2026–27 से किसानों को झटका: न सम्मान निधि बढ़ी, न MSP की गारंटी, खुद को ठगा महसूस कर रहा अन्नदाता
बिजनौर । 1 फरवरी 2026
केंद्रीय बजट 2026–27 से देश के करोड़ों किसानों को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन बजट पेश होते ही ये उम्मीदें टूटती नजर आईं। किसान जिस राहत की प्रतीक्षा कर रहे थे—वह इस बजट में कहीं नजर नहीं आई। न तो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाई गई, न ही फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी पर कोई ठोस घोषणा हुई। इसके साथ ही कृषि यंत्रों पर जीएसटी हटाने की मांग को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।
“फिर से किसान को छला गया” – भाकियू
भारतीय किसान यूनियन, बिजनौर के जिला अध्यक्ष सुनील प्रधान ने बजट पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा—
“किसानों को उम्मीद थी कि सरकार सम्मान निधि बढ़ाएगी, फसलों की MSP की गारंटी देगी और कृषि यंत्रों को जीएसटी से मुक्त करेगी, लेकिन बजट में ऐसा कुछ नहीं किया गया। फिर से किसान अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। यह बजट किसानों के लिए पूरी तरह निराशाजनक है।”
आय बढ़ाने के दावे, जमीन पर राहत नहीं
वहीं भारतीय किसान यूनियन लोकशक्ति के जिलाध्यक्ष (बिजनौर) एवं उत्तराखंड प्रदेश प्रभारी चौ. वीर सिंह सहरावत ने भी बजट को किसानों के साथ अन्याय बताया। उन्होंने कहा—
“केंद्रीय बजट 2026–27 से किसानों को सरकार से बड़ी आशाएं थीं, लेकिन किसानों की आय और उत्पादकता बढ़ाने के नाम पर एक बार फिर छल किया गया है। बजट में किसानों के लिए कुछ भी ठोस नहीं है। किसान खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।”
महंगाई बनाम खेती: बढ़ती लागत, घटती राहत
किसानों का कहना है कि जहां एक ओर डीजल, खाद, बीज, कीटनाशक और कृषि यंत्रों की लागत लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार ने किसानों को सीधी राहत देने से परहेज किया है। सम्मान निधि की राशि वर्षों से जस की तस बनी हुई है, जबकि खेती की लागत कई गुना बढ़ चुकी है।
MSP गारंटी पर चुप्पी, आंदोलन की आशंका
किसान संगठनों का आरोप है कि MSP की कानूनी गारंटी किसानों की सबसे बड़ी मांग रही है, लेकिन बजट में इस पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गई। इससे आने वाले समय में किसान आंदोलनों के तेज होने की आशंका भी जताई जा रही है।
कुल मिलाकर किसान निराश
कुल मिलाकर केंद्रीय बजट 2026–27 किसानों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका। सरकार के ‘किसान हितैषी’ दावों और बजट की जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर साफ दिखाई दे रहा है। बजट के बाद गांव-देहात में चर्चा का विषय यही है कि “अन्नदाता को फिर से नजरअंदाज कर दिया गया।”
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