सम्मान, सम्मेलन और सेल्फ़ी की कविता: क्या जन-सरोकार से कटती जा रही है आज की कविता?

विशेष टिप्पणी | डॉ. सत्यवान सौरभ
जब कविता मंचों तक सिमट जाए, कवि ही कवि के श्रोता बन जाएँ और साहित्यिक लोकतंत्र तमगों व प्रमाण-पत्रों में बदल जाए—तो सवाल उठना लाज़मी है।
– संपादक
कविता हमेशा से समाज की सामूहिक चेतना की आवाज़ रही है। वह केवल शब्दों का सौंदर्य नहीं, बल्कि समय से टकराने का साहस भी रही है। लेकिन आज के कवि सम्मेलनों, साहित्यिक आयोजनों और तथाकथित सांस्कृतिक मंचों पर नज़र डालें, तो एक असहज सच्चाई सामने आती है—क्या कविता अपने मूल जन-सरोकारों से दूर होती जा रही है?
कवि मंच पर, श्रोता भी कवि—तो संवाद कहाँ?
आज अधिकतर साहित्यिक आयोजनों का दृश्य लगभग एक-सा है। मंच पर कवि हैं, सामने बैठे श्रोता भी अधिकांशतः कवि ही हैं।
- कवि एक-दूसरे को बुलाते हैं
- कवि ही किताबें खरीदते हैं
- और सम्मान भी आपस में बाँट लिए जाते हैं
आयोजक, अतिथि, निर्णायक और प्रशंसक—सब वही। यह साहित्यिक लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक आत्ममुग्ध बंद वृत्त बन चुका है, जहाँ आम समाज की भागीदारी लगभग शून्य है।
❓ कविता आखिर किसके लिए?
यह सवाल आज सबसे ज़रूरी है—
क्या कविता केवल कवियों के लिए रह गई है?
यदि कविता का पाठक वही है जो स्वयं कविता लिख रहा है, तो यह संवाद नहीं, आत्मसंवाद है।
साहित्य का इतिहास गवाह है कि जब रचनात्मक अभिव्यक्ति अपने सामाजिक सरोकार खो देती है, तो वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाती है।
कविता की जड़ें मंच में नहीं, जीवन में थीं
कविता का जन्म वातानुकूलित सभागारों में नहीं हुआ था।
वह पैदा हुई थी—
- खेतों की मिट्टी से
- मज़दूर के पसीने से
- स्त्री की चुप्पी से
- दलित के अपमान से
- आदिवासी के विस्थापन से
कबीर, निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध, पाश—इनकी कविता आज भी जीवित है क्योंकि वह सत्ता से सवाल करती है, न कि उसके समीकरण साधती है।
सम्मान संस्कृति: रचना या नेटवर्किंग?
आज सोशल मीडिया पर साहित्यिक आयोजनों की तस्वीरें भरी पड़ी हैं—
मुस्कुराते चेहरे, शॉल, स्मृति-चिह्न और प्रशस्ति-पत्र।
सम्मान अपने-आप में गलत नहीं है, सवाल यह है—
👉 सम्मान किसे और क्यों?
👉 क्या वह रचना के सामाजिक प्रभाव के लिए है, या आपसी पहुँच और नेटवर्किंग का नतीजा?
जब कविता ब्रांड बन जाए
आज कवि की पहचान उसकी कविता से कम और
- मंचों की संख्या
- आयोजनों की उपस्थिति
- और तस्वीरों की गिनती से ज़्यादा होने लगी है
यह प्रवृत्ति कविता को आत्मप्रचार का माध्यम बना देती है—जो रचनात्मकता के लिए ख़तरनाक संकेत है।
आम पाठक कविता से दूर क्यों?
इसका दोष केवल पाठक पर नहीं डाला जा सकता।
जब कविता आम जीवन की भाषा, पीड़ा और सवालों से कट जाती है, तब वह सिर्फ़ बौद्धिक अभ्यास बनकर रह जाती है।
नतीजा—कविता मंचों तक सिमट जाती है और समाज से उसका संवाद टूट जाता है।
कवि का धर्म: सत्ता को सहज नहीं, असहज करना
कविता का काम सत्ता के अनुकूल होना नहीं, बल्कि उससे सवाल करना है।
लेकिन आज कई कवि टकराव के बजाय सुरक्षा चुनते हैं।
यही सुरक्षा धीरे-धीरे कविता की आत्मा को खोखला कर देती है।
सम्मेलन संस्कृति पर आत्ममंथन ज़रूरी
सवाल यह नहीं कि कवि सम्मेलन हों या न हों,
सवाल यह है कि—
- क्या कविता केवल मंचों तक सीमित रहे?
- या स्कूलों, कॉलेजों, गाँवों, मज़दूर बस्तियों और आंदोलनों तक पहुँचे?
यदि कविता समाज से कट गई, तो उसका प्रभाव भी शून्य हो जाएगा।
‘सरोकार’ भी कहीं फैशन तो नहीं?
कई बार मंचों पर गरीबी, स्त्री और हाशिये की बातें होती हैं,
लेकिन वे केवल प्रतीकात्मक रह जाती हैं।
कविता तब तक जीवित नहीं रह सकती, जब तक वह जोखिम उठाने का साहस न करे—वैचारिक भी और सामाजिक भी।
आत्मालोचना ही कविता की प्राणवायु
कविता का संकट केवल कवियों का नहीं,
यह समाज की सांस्कृतिक चेतना का संकट है।
जब साहित्य आत्मालोचना छोड़ देता है, तो वह सजावट बन जाता है।
अंतिम सवाल—क्यों लिख रहे हैं हम?
आज हर कवि को अपने भीतर झाँककर पूछना होगा—
👉 क्या हम सम्मान के लिए लिख रहे हैं?
👉 मंच के लिए?
👉 या समाज के लिए?
कविता का मूल्य तालियों या प्रमाण-पत्रों से नहीं आँका जाता।
उसका मूल्य तय होता है—
वह किसके पक्ष में खड़ी है और किससे सवाल कर रही है।
यदि कविता जीवन की धड़कन से कट गई, तो वह संग्रहालय की वस्तु बन जाएगी—सुंदर, पर निष्प्राण।
कविता को जीवित रखने के लिए कवि को जीवित समाज से जुड़ना होगा।
यही उसका धर्म है, यही उसकी सार्थकता।
लेखक परिचय
डॉ. सत्यवान सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवि, लेखक और सामाजिक विचारक
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