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खामोशी अपराध है: अमरोहा में भूजल ज़हर, नेता मौन

खामोशी अपराध है: अमरोहा में भूजल ज़हर, नेता मौन

विशेष विश्लेषणात्मक रिपोर्ट। अवनीश त्यागी 

अमरोहा, 22 जनवरी।
खामोशी अपराध है, सवाल पूछना ज़रूरी है”—इस एक पंक्ति में अमरोहा के गजरौला क्षेत्र में उबलते जनआक्रोश की पूरी कहानी छिपी है। विकास के नाम पर पर्यावरण और मानव जीवन को दांव पर लगाए जाने के आरोपों के बीच भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा का बेमियादी धरना आज 33वें दिन में प्रवेश कर गया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिस मुद्दे पर जनस्वास्थ्य, खेती और जलस्रोतों का भविष्य टिका है, उस पर स्थानीय राजनीति लगभग मौन साधे हुए है।

भाकियू संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने धरनास्थल पर पहुंचकर सिस्टम, राजनीति और प्रशासन—तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि “लापरवाह सिस्टम को जगाने, सार्वजनिक सुरक्षा बढ़ाने और खतरनाक रासायनिक कारखानों की सख्त निगरानी कराने के बजाय जनप्रतिनिधि मूक-बधिर बने बैठे हैं। यह चुप्पी सिर्फ संवेदनहीनता नहीं, बल्कि अपराध है।”

जैव विविधता से तबाही तक: कैसे बदली गजरौला की तस्वीर

कभी जैव विविधता और स्वच्छ जल के लिए पहचाने जाने वाले गजरौला क्षेत्र की पहचान अब रासायनिक प्रदूषण से जुड़ती जा रही है। नाईपुरा गांव की नाजुक पारिस्थितिकी पर मंडराता खतरा अब केवल आशंका नहीं, बल्कि ग्रामीणों के रोज़मर्रा के जीवन की सच्चाई बन चुका है।

नरेश चौधरी ने आरोप लगाया कि पर्यावरण-अनुकूल होने के कागजी दावों के साथ स्थापित रासायनिक कारखानों ने भूजल को जहरीला बना दिया है। क्षेत्र पर बढ़ते जलग्रहण दबाव का सीधा असर बगद नदी पर पड़ा है, जो धीरे-धीरे एक “मृत नदी” में तब्दील हो रही है।
उनका दावा है कि राजनीतिक संरक्षण और नौकरशाही की कथित मिलीभगत के चलते जलस्रोतों की नैसर्गिकता खत्म होती जा रही है, जबकि किसानों और ग्रामीणों की आपत्तियों को वर्षों से नजरअंदाज किया गया।

राजनीति से मोहभंग: ‘नेताओं से बेहतर नौकरशाह’

धरने में मौजूद प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान का बयान किसानों के गहरे आक्रोश को उजागर करता है। उन्होंने कहा,
“राजनेताओं की चुप्पी ने हमें इतना आहत कर दिया है कि अब लोग किसी राजनीतिक दल के बजाय नौकरशाहों को वोट देना ज्यादा बेहतर समझने लगे हैं। निर्वाचित होने के बाद भी नेता उन्हीं के लिए काम करते हैं।”

यह टिप्पणी केवल नाराज़गी नहीं, बल्कि लोकतंत्र में भरोसे के टूटने का संकेत मानी जा रही है।

दूषित पानी, बीमारियां और उजड़ती खेती

धरनास्थल पर मौजूद पीड़ित ग्रामीणों ने बताया कि दूषित भूजल से गंभीर बीमारियां फैल रही हैं। खेती, जो उनकी आजीविका का मुख्य साधन है, लगातार प्रभावित हो रही है। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी ने हालात और भयावह बना दिए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शिकायतें करने के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिल रहा।

भाकियू अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश प्रभारी व मंडल अध्यक्ष अहसान अली ने सरकार और प्रशासन से तत्काल कदम उठाने की मांग की। उन्होंने कहा कि पीड़ितों को:

  • एम्स दिल्ली के विशेषज्ञों से मुफ्त इलाज,
  • सुरक्षित पेयजल की स्थायी व्यवस्था,
  • संपत्ति और खेती को हुई अपूर्णीय क्षति का मुआवजा,
  • दूषित जलस्रोतों के उपयोग पर रोक,
  • पानी की नियमित जांच और शुद्धिकरण,
  • तथा लंबी अवधि का वाटर सिक्योरिटी प्लान
    तुरंत लागू किया जाना चाहिए।

रासायनिक उत्सर्जन के खिलाफ बनती जनलहर

यह आंदोलन अब केवल एक गांव या कुछ किसानों का नहीं रह गया है। यह रासायनिक उत्सर्जन के खिलाफ उभरती जनलहर बन चुका है। किसान स्पष्ट कहते हैं—वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास जो पर्यावरण संतुलन, जलस्रोतों और मानव जीवन को नष्ट कर दे, स्वीकार्य नहीं हो सकता।

धरने में वयोवृद्ध किसान नेता चौधरी चरणसिंह, विजय सिंह गंगाराम, सोमपाल सिंह, सुरेश चंद्र, समरपाल सैनी, ओम प्रकाश सिंह, रामप्रसाद, ओमपाल सिंह, होमपाल सिंह सहित बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण मौजूद रहे।

निष्कर्ष: सवाल अब और तेज होंगे

अमरोहा का यह आंदोलन एक बड़ा और असहज सवाल खड़ा करता है—
क्या विकास की कीमत पर पर्यावरण और जनजीवन की बलि दी जाती रहेगी, या सिस्टम अब जागेगा?

किसानों का संदेश साफ है:
अगर सवालों को दबाया गया, तो यह आंदोलन और व्यापक होगा।
क्योंकि अब यह सिर्फ पानी या खेती की लड़ाई नहीं, बल्कि जीने के अधिकार की लड़ाई बन चुकी है।

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