नववर्ष की दस्तक, गजरौला में ज़हर की बारिश !

‘फॉरएवर केमिकल’ से घिरा औद्योगिक इलाका, किसान बोले—हवा भी मार रही, पानी भी
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अमरोहा/गजरौला | ग्राउंड ज़ीरो रिपोर्ट
नववर्ष के स्वागत की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है, लेकिन गजरौला और आसपास के गांवों के लिए यह समय उत्सव नहीं, अस्तित्व की लड़ाई बन गया है।
औद्योगिक इकाइयों से निकल रहे फॉरएवर केमिकल, ज़हरीली गैसें और प्रदूषित भूजल के खिलाफ शहबाजपुर डोर में किसानों का धरना आठवें दिन भी लगातार जारी रहा।
कड़ाके की ठंड, घना कोहरा और दमघोंटू स्मॉग—इन सबके बीच किसान जमीन पर डटे हुए हैं, क्योंकि उनके मुताबिक अब सवाल सिर्फ़ पर्यावरण का नहीं, जीने के हक़ का है।
“फाइलों में गांव गुलाबी, ज़मीनी हकीकत ज़हरीली”
भारतीय किसान यूनियन संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने धरनास्थल से सरकार और सिस्टम को सीधी चुनौती दी। जनकवि अदम गोंडवी की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा—
“तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक प्रदूषित भूजल की वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती और दोषी रासायनिक कारखानों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक धरना जारी रहेगा।
गजरौला बना गैस-चैंबर: सांस लेना भी जोखिम
किसान नेता ने चेतावनी दी कि दिसंबर के बचे हुए दिन और भयावह साबित हो सकते हैं।
बीते आठ दिनों से इलाके की हवा लगातार ज़हरीली बनी हुई है।
कोहरा और नमी के कारण हवा में मौजूद प्रदूषक ऊपर उठ नहीं पा रहे, बल्कि ज़मीन की सतह पर ही मंडरा रहे हैं।
विभिन्न गैसों की केमिकल रिएक्शन से ऐसी-ऐसी विषैली गैसें बन रही हैं, जिनका असर सीधे फेफड़ों, आंखों और त्वचा पर पड़ रहा है।
एक-एक गांव ज़हर की चपेट में
नाईपुरा, शहबाजपुर डोर, रसूलपुर, फाजलपुर गोसाईं, तिगरिया भूड़ और पूरा गंगेश्वरी क्षेत्र—
यह सिर्फ़ नाम नहीं, बल्कि प्रदूषण की लिस्ट बन चुकी है।
इन इलाकों में घना कोहरा, धुंध और ज़हरीली हवा लोगों की दिनचर्या को प्रभावित कर रही है।
बच्चे, बुज़ुर्ग और बीमार सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
भूजल बना ‘धीमा ज़हर’, नाइट्रेट ने बजाई खतरे की घंटी
किसानों का आरोप है कि गजरौला-गंगेश्वरी का भूजल अब पीने योग्य नहीं रहा।
भूजल में नाइट्रेट की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है, जिससे कैंसर, ब्लू बेबी सिंड्रोम और पेट संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
नरेश चौधरी ने कहा कि
सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड (CGWB) द्वारा तत्काल जांच कराना अनिवार्य है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई।
सरकारी चुप्पी या साजिश?
धरनास्थल से उठता सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह लापरवाही है या जानबूझकर की गई अनदेखी?
आरोप है कि
राजनेताओं, नौकरशाहों और औद्योगिक घरानों का अपवित्र गठजोड़
गजरौला की जल, जंगल, ज़मीन और नदियों को वर्षों से निचोड़ता आ रहा है।
खनिज (बगद), जंगल और भूजल—
सब कुछ मुनाफे के मॉडल की भेंट चढ़ चुका है।
विकास बनाम विनाश: कौन ज़िम्मेदार?
किसान नेताओं का कहना है कि जिस तथाकथित विकास मॉडल का ढोल पीटा जा रहा है,
उसने आम आदमी को और गरीब, और बीमार बना दिया है।
स्थानीय लोग बेबस होकर अपनी ही चुनी सरकार से पूछ रहे हैं—
क्या यही विकास है?
“हमें अर्थशास्त्री नहीं, पर्यावरण के रक्षक चाहिए”
नरेश चौधरी का दो-टूक संदेश—
“देश को अर्थशास्त्रियों से ज़्यादा
ज़िम्मेदार पर्यावरण प्रबंधकों की जरूरत है।”
अब यह आंदोलन सिर्फ़ किसानों का नहीं रहा,
बल्कि जल-जंगल-ज़मीन बचाने की जनलड़ाई बनता जा रहा है।
धरनास्थल पर जुटा किसान नेतृत्व
धरने में राष्ट्रीय मुख्य सचिव अरुण सिद्धू, राष्ट्रीय सचिव चंद्रपाल सिंह,
दलजीत सिंह, तेजपाल सिंह, जगदेव सिंह, तस्लीम चौधरी, शानू चौधरी,
अभिषेक सिरोही, जर्रार चौधरी, अमन चौधरी, उस्मान चौधरी,
मलखान सिंह, अंसार चौधरी, सलमान चौधरी और जीशान चौधरी सहित
बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।
अंतिम सवाल: नववर्ष का तोहफ़ा क्या होगा—ज़िंदगी या ज़हर?
गजरौला आज सरकार को चेतावनी दे रहा है—
अगर पॉल्यूशन गाइडलाइन सख्ती से लागू नहीं हुईं,
तो यह आंदोलन नववर्ष में और उग्र रूप ले सकता है।
यह लड़ाई हवा-पानी की नहीं,
पीढ़ियों के भविष्य की है।












