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शिक्षा के मंदिर में साज़िश? जनता इंटर कॉलेज में 30 साल से ‘साइलेंट स्कैम’ का आरोप

          एक्सक्लूसिव इन्वेस्टिगेटिव सीरीज़ – पार्ट-1

शिक्षा के मंदिर में साज़िश? जनता इंटर कॉलेज में 30 साल से ‘साइलेंट स्कैम’ का आरोप

फीस, अनुदान, फर्जी खाते और काग़ज़ी पद—कैसे परत-दर-परत खुल रहा है एक कथित शिक्षा घोटाला

अवनीश त्यागी की ग्राउंड रिपोर्ट | डिजिटल इन्वेस्टिगेशन

बिजनौर।
जनता इंटर कॉलेज—एक ऐसा नाम, जिससे हजारों छात्रों का भविष्य जुड़ा रहा। लेकिन अब यही संस्थान भ्रष्टाचार, गबन और सुनियोजित फर्जीवाड़े के गंभीर आरोपों के घेरे में है। शुरुआती दस्तावेज़, शिकायत पत्र और आरोपों का अध्ययन यह संकेत देता है कि यह मामला एक-दो साल की गड़बड़ी नहीं, बल्कि तीन दशकों से चला आ रहा एक ‘सिस्टमेटिक स्कैम’ हो सकता है।

इस एक्सक्लूसिव इन्वेस्टिगेटिव सीरीज़ के पार्ट–1 में हम सामने रख रहे हैं—
➡️ शिकायत की बुनियाद,
➡️ पैसे के खेल का प्रारंभिक ढांचा,
➡️ और वे सवाल, जिनका जवाब सिस्टम को देना होगा।

शिकायत कहां से शुरू हुई?

मामले की शुरुआत होती है डॉ. सत्यप्रकाश त्यागी द्वारा दिए गए उस प्रार्थना पत्र से, जिसमें जनता इंटर कॉलेज के प्रबंधन से जुड़े लोगों पर करोड़ों रुपये के गबन का आरोप लगाया गया है।

प्रार्थना पत्र में दावा किया गया है कि

  • छात्रों से वसूली गई फीस,
  • सरकारी अनुदान,
  • और बैंक खातों में जमा राशि
    को निजी लाभ के लिए सुनियोजित तरीके से हड़प लिया गया

सबसे चौंकाने वाली बात—यह सब सालों तक बिना किसी ठोस निगरानी के चलता रहा।

फीस वसूली का ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ सिस्टम

शिकायत के अनुसार, कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों से
✔️ हर माह नियमित फीस ली गई,
❌ लेकिन न तो विधिवत रसीद दी गई,
❌ और न ही पूरी रकम स्कूल के अधिकृत खातों में दिखाई गई।

यानी फीस वसूली का एक ऐसा सिस्टम, जो
➡️ काग़ज़ों से बाहर,
➡️ रिकॉर्ड से अलग,
➡️ और जांच से बचने के लिए डिज़ाइन किया गया प्रतीत होता है।

बैंक खातों का जाल: स्कूल के नाम पर, नियंत्रण किसी और का?

प्राथमिक दस्तावेज़ों के अनुसार जनता इंटर कॉलेज के नाम पर

  • जिला सहकारी बैंक,
  • पंजाब नेशनल बैंक,
  • और अन्य बैंकों में
    दर्जनों खाते खोले गए

गंभीर आरोप यह है कि इन खातों से ऐसे लोगों द्वारा धन निकासी की गई,
जिनके पास
❓ न वैधानिक अधिकार था,
❓ न अधिकृत पद,
❓ और न ही संस्था की स्वीकृति।

यहीं से सवाल उठता है—
👉 क्या यह सिर्फ प्रबंधन की चूक थी या बैंकिंग सिस्टम की मिलीभगत?

30 साल की समयरेखा—संयोग या सुनियोजित योजना?

प्रार्थना पत्र में यह स्पष्ट कहा गया है कि यह कथित फर्जीवाड़ा
25 से 30 वर्षों से लगातार चलता रहा।

संरचना कुछ यूं बताई गई है—

  • कक्षा 6 से 8: सरकारी सहायता प्राप्त
  • कक्षा 9 से 12: स्ववित्तपोषित

आरोप है कि स्ववित्तपोषित कक्षाओं से हर वर्ष 40–50 लाख रुपये तक की फीस वसूली गई,
लेकिन इसका बड़ा हिस्सा
➡️ न तो बैलेंस शीट में दिखा,
➡️ न ऑडिट में उभरा,
➡️ न ही किसी जांच का विषय बना।

काग़ज़ों का खेल: ‘काग़ज़ी प्रधानाचार्य’ की एंट्री

शिकायत की सबसे संवेदनशील परत है—दस्तावेज़ी हेराफेरी

आरोप है कि

  • कक्षा 6–8 के लिए नियुक्त प्रधानाचार्य को
  • कक्षा 9–12 का भी प्रधानाचार्य दर्शाया गया,

ताकि
✔️ नियमों को दरकिनार किया जा सके,
✔️ और अवैध वित्तीय निर्णयों को वैध दिखाया जा सके।

यानी पद काग़ज़ों में बदले, पैसे ज़मीन पर बहे।

पुलिस की चुप्पी—सबसे बड़ा सवाल

प्रार्थी का दावा है कि

  • पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना पत्र दिए गए,
  • स्थानीय स्तर पर शिकायतें की गईं,

लेकिन
अब तक न FIR,
न कोई प्रभावी जांच

यहीं से यह मामला सिर्फ एक कॉलेज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि
➡️ प्रशासनिक उदासीनता,
➡️ निगरानी तंत्र की विफलता,
➡️ और संभावित संरक्षण
जैसे सवाल खड़े करता है।

पार्ट–1 का निष्कर्ष: सवाल बहुत हैं, जवाब अभी नहीं

इस पहले हिस्से में जो सामने आया, वह सिर्फ संकेत है—
पूरी कहानी अभी बाकी है।

यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला
🔴 शिक्षा व्यवस्था में जड़ जमाए भ्रष्टाचार,
🔴 छात्रों के भविष्य से खिलवाड़,
🔴 और सरकारी धन के दुरुपयोग
का बड़ा उदाहरण बन सकता है।

एक्सक्लूसिव रिपोर्ट : अवनीश त्यागी
(इन्वेस्टिगेटिव सीरीज़ | डिजिटल न्यूज़ पोर्टल)

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