ज़हर में घुलता गजरौला: विकास की चकाचौंध में दम तोड़ती सांसें
भूजल में 60 गुना क्रोमियम, कैंसरकारी जीन पर हमला; NH-9 पर किसानों का पांचवें दिन भी बेमियादी ऐलानिया संघर्ष
अवनीश त्यागी के साथ जितेन्द्र शर्मा की विशेष, विश्लेषणात्मक रिपोर्ट
अमरोहा | 25 दिसंबर
उत्तर प्रदेश का औद्योगिक नगर गजरौला आज विकास का मॉडल नहीं, बल्कि प्रदूषण का चेतावनी बोर्ड बनता जा रहा है। रासायनिक कारखानों से निकला ज़हर पानी, हवा और मिट्टी में इस कदर घुल चुका है कि यह इलाका धीरे-धीरे स्वास्थ्य आपातकाल की ओर बढ़ रहा है। सवाल सीधा है—क्या औद्योगिक तरक्की की कीमत इंसानी ज़िंदगियों से वसूली जाएगी?
NH-9 पर धरना: भूजल बचाने की जंग सड़क पर
दिल्ली-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग-09 पर स्थित शहबाजपुर डोर, गजरौला में भूजल प्रदूषण के खिलाफ किसानों का बेमियादी धरना गुरुवार को पांचवें दिन भी जारी रहा। सड़कों पर उतरे किसानों का कहना है कि जब तक ज़हर फैलाने वाले कारखानों पर ठोस कार्रवाई नहीं होगी, आंदोलन थमेगा नहीं।
धरने को समर्थन देते हुए जिला पंचायत सदस्य धर्मपाल सिंह खडकवंशी ने प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण तंत्र पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा—
“रिपोर्टों और फाइलों में प्रदूषण नियंत्रण के दावे चमकते हैं, लेकिन ज़मीन पर सच्चाई दमघोंटू है। यह निगरानी व्यवस्था की खुली विफलता है।”
उन्होंने चेताया कि अब यह मुद्दा सामान्य प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आपात स्थिति बन चुका है, जिस पर तत्काल और निर्णायक कार्रवाई जरूरी है।
वैज्ञानिक चेतावनी: डीएनए तक पहुंच चुका ज़हर
भारतीय किसान यूनियन (संयुक्त मोर्चा) के अध्यक्ष नरेश चौधरी ने एक चौंकाने वाला तथ्य सामने रखते हुए अक्टूबर 2025 में ‘क्लीनिकल एपीजेनेटिक्स जर्नल’ में प्रकाशित शोध का हवाला दिया।
इस शोध के अनुसार—
- भूजल में क्रोमियम 60 गुना अधिक
- कैडमियम घातक सीमा से ऊपर
- जांच किए गए मरीजों में 64% में कैंसर बढ़ाने वाले जीन परिवर्तन
विशेषज्ञों के मुताबिक ये भारी धातुएं डीएनए को क्षतिग्रस्त कर किडनी, लीवर और फेफड़ों को भीतर से खोखला कर देती हैं। यह असर अचानक नहीं, बल्कि धीमे ज़हर की तरह होता है—जो पहचान में आते-आते जानलेवा बन जाता है।
गजरौला में डेटा शून्य, खतरा अनंत
नरेश चौधरी ने कहा कि हैरानी की बात यह है कि गजरौला जैसे संवेदनशील औद्योगिक क्षेत्र में आज तक कोई व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य अध्ययन नहीं किया गया। बीमारियों के आंकड़े न होने से सरकार आंख मूंदे बैठी है।
उन्होंने मांग की कि—
- जल, वायु और मृदा प्रदूषण पर स्थायी निगरानी तंत्र बने
- औद्योगिक अपशिष्ट के उत्सर्जन स्रोतों की मैपिंग हो
- दूषित इलाकों में स्वच्छ पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था तत्काल लागू की जाए
प्रदूषित पानी की बोतलें, सिस्टम के मुंह पर सवाल
धरने के दौरान भाकियू (संयुक्त मोर्चा) के कार्यकर्ताओं ने राहगीरों को प्रदूषित पानी की बोतलें दिखाकर एक प्रतीकात्मक लेकिन तीखा संदेश दिया—
“अगर यही पानी भविष्य है, तो यह विकास नहीं विनाश है।”
यह दृश्य खुद-ब-खुद सवाल करता है कि प्रशासनिक तंत्र आखिर किस हद तक बेखबर बना रहेगा।
मिट्टी से मवेशी तक, हर कड़ी बीमार
प्रदूषण का असर केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। फसलें कमजोर, मवेशी बीमार और मिट्टी की उर्वरता नष्ट होती जा रही है। किसान कहते हैं कि उनकी ज़मीन अब अन्न नहीं, बल्कि चिंता उगा रही है।
जनसमर्थन बढ़ा, आंदोलन को ताकत
धरने में राष्ट्रीय मुख्य सचिव अरुण सिद्धू, रामकृष्ण चौहान, अमरजीत देओल, सुशील चौधरी, चौधरी चरण सिंह, राहुल सिद्धू, शान चौधरी, मनजीत चौधरी, अमित सिद्धू, जरार चौधरी, ईशान चौधरी, साकिब चौधरी, अमजद चौधरी सहित** अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। उनकी मौजूदगी ने आंदोलन को सामाजिक और नैतिक बल दिया।
विश्लेषण | सवाल सिर्फ प्रदूषण का नहीं, भविष्य का है
गजरौला आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां निर्णय टालना सीधे मानव जीवन से समझौता होगा। यदि अब भी सख्त कदम नहीं उठे, तो यह इलाका आने वाली पीढ़ियों के लिए बीमारी और बर्बादी की विरासत छोड़ जाएगा।
विकास चाहिए—लेकिन ज़हर की कीमत पर नहीं।
अब यह देखना है कि शासन-प्रशासन चेतता है या गजरौला यूं ही चुपचाप ज़हर पीता रहेगा।














