🔴 एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट
खेत से सचिवालय तक किसानों की आवाज़: बिजनौर में उबाल, 7 मांगों के साथ मुख्यमंत्री तक पहुँचा आक्रोश

बिजनौर।
सुबह की धुंध अभी पूरी तरह छंटी भी नहीं थी कि बिजनौर के ग्रामीण अंचलों से किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और मोटरसाइकिलों पर सवार होकर पंचायत स्थल की ओर बढ़ने लगे। चेहरों पर गुस्सा, आवाज़ में पीड़ा और शब्दों में साफ संदेश—अब और नहीं।
भारतीय किसान यूनियन लोक शक्ति की मासिक पंचायत केवल एक औपचारिक बैठक नहीं रही, बल्कि यह उस गहराते कृषि संकट का जीवंत चित्र बन गई, जो लंबे समय से खेतों में सुलग रहा है और अब खुलकर सामने आ चुका है।
घटतौली: खेत में पसीना, कांटे पर धोखा
किसानों ने आरोप लगाया कि चीनी मिलों में गन्ने की घटतौली अब अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था बन चुकी है। कांटे पर तौल कम दिखाई जाती है और आवाज़ उठाने वाले किसानों को ही परेशान किया जाता है।
ओवरलोडिंग और बढ़ा भाड़ा—किसान पर दोहरी मार
गन्ना ढोने वाले ट्रकों की ओवरलोडिंग पर प्रशासन की चुप्पी पर सवाल उठे। किसानों का कहना है कि—
ओवरलोडिंग का जोखिम किसान उठाता है
और बढ़े हुए भाड़े का बोझ भी उसी पर डाला जाता है
बिना सहमति बढ़ाया गया ढुलाई भाड़ा किसानों की कमर तोड़ रहा है।
500 रुपये प्रति कुंतल: सम्मान या संघर्ष?
पंचायत में सबसे तीखी आवाज गन्ना मूल्य को लेकर उठी। किसानों ने दो टूक चेतावनी दी—
“500 रुपये प्रति कुंतल नहीं तो आंदोलन तय है।”
बढ़ती लागत के बीच मौजूदा गन्ना मूल्य को किसानों ने “जिंदा रहने लायक भी नहीं” बताया।
आवारा पशु: खेतों में पहरा, घरों में चिंता
किसानों ने बताया कि फसल बचाने के लिए उन्हें रात-रात भर खेतों में जागना पड़ता है। गौशालाओं के नाम पर बजट तो है, लेकिन ज़मीन पर सिर्फ नुकसान दिखाई दे रहा है।
नेतृत्व का स्पष्ट संदेश
पंचायत की अध्यक्षता कर रहे जिला अध्यक्ष चौधरी वीर सिंह सहारावत ने कहा—
“यह ज्ञापन सिर्फ शुरुआत है। अगर सरकार नहीं जागी तो किसान सड़क पर उतरने को मजबूर होंगे।”
खोजी (Investigative) रिपोर्ट
बिजनौर में किसान क्यों टूट रहा है? घटतौली, सहकारी समितियाँ और स्मार्ट मीटर के पीछे की सच्चाई
बिजनौर।
किसानों की ये मांगें भावनात्मक नहीं, बल्कि प्रणालीगत विफलता का ठोस प्रमाण हैं। पंचायत में उठे मुद्दों ने उन खामियों को उजागर किया है, जो अब तक फाइलों में दबाकर रखी गई थीं।
घटतौली: किसकी मिलीभगत?
स्थानीय किसानों का दावा है कि गन्ना तौल केंद्रों पर—
कांटा ऑपरेटर
गन्ना विभाग व बाट-माप विभाग के अधिकारी
और मिल प्रबंधन
के बीच अघोषित तालमेल है। शिकायत करने वाले किसानों को अगली पर्चियों में “समस्या वाला किसान” बताकर हाशिये पर डाल दिया जाता है।
सहकारी समितियाँ: सुविधा या शोषण का माध्यम?
सबसे गंभीर आरोप सहकारी समितियों को लेकर सामने आए। किसानों का कहना है कि—
खाद, बीज और ऋण का विवरण
खसरा-खतौनी में दर्ज कर दिया जाता है
जिससे भविष्य में किसान कर्जदार साबित हो सकता है, जबकि वास्तव में उसे राहत नहीं, बोझ दिया जा रहा है।
स्मार्ट मीटर: तकनीक या डर का औजार?
ग्रामीण इलाकों में लगाए जा रहे स्मार्ट मीटर किसानों के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। आरोप है कि—
बिजली बिल अचानक कई गुना बढ़ जाते हैं
शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं होती
इसी कारण पंचायत ने गांवों में स्मार्ट मीटर लगाए जाने का खुला विरोध दर्ज कराया।
सरकार के सामने असली सवाल
यह सिर्फ एक संगठन की पंचायत नहीं, बल्कि सरकार के लिए सीधा सवाल है—
➡️ क्या किसान सिर्फ उत्पादन की मशीन बनकर रह गया है?
➡️ या उसकी समस्याओं को नीति निर्माण में वास्तविक जगह मिलेगी?
यदि इन सवालों का जवाब समय रहते नहीं मिला, तो बिजनौर से उठी यह आवाज़ प्रदेशव्यापी किसान आंदोलन का रूप ले सकती है।










