“अब नहीं चलेगा मनमानी का खेल — बिना शासन अनुमति के तबादलों पर शासन की गाज, शिक्षा विभाग में मचा हड़कंप”
अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा का सख्त फरमान — ‘मूल तैनाती छोड़कर कहीं और बैठे कर्मचारी तुरंत लौटें, वरना कार्रवाई तय’
🔹 मुख्य बिंदु — एक नजर में
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शासन ने पकड़ी अनियमितता: बिना अनुमति के किए जा रहे थे तबादले और संलग्नताएँ
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सभी आदेश होंगे निरस्त, कर्मचारी भेजे जाएंगे मूल तैनाती पर
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भविष्य में बिना शासन अनुमति किसी भी नई तैनाती पर सख्त रोक
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महानिदेशक स्कूल शिक्षा से 10 दिन में मांगी रिपोर्ट
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जिलास्तरीय अधिकारियों की बढ़ी धड़कनें — शुरू हुई फाइलों की पड़ताल
लखनऊ से शिक्षा विभाग में भूचाल जैसी हलचल
उत्तर प्रदेश शासन ने शिक्षा विभाग के भीतर जमी “संलग्नता संस्कृति” पर अब बड़ा वार किया है।
21 अक्टूबर 2025 को जारी एक आदेश में अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने सख्त चेतावनी दी है कि
“शासन की अनुमति के बिना किसी को भी उसके मूल पदस्थ स्थान से हटाकर कहीं और भेजना अब अस्वीकार्य है।”
इस आदेश के बाद पूरे शिक्षा तंत्र — बेसिक से लेकर माध्यमिक तक — में अफसरों और कर्मचारियों के बीच भारी बेचैनी देखने को मिल रही है।
शासन ने क्यों लिया यह सख्त फैसला?
पिछले कुछ महीनों से लगातार शिकायतें आ रही थीं कि
कई अधिकारियों और शिक्षकों को उनके मनपसंद स्कूलों या कार्यालयों में संलग्न किया जा रहा था,
वो भी बिना शासन की अनुमति के।
कई स्थानों पर तो वर्षों से कर्मचारी अपने “आरामदायक” पदों पर टिके हुए थे,
जबकि ग्रामीण व दुर्गम क्षेत्रों के विद्यालय शिक्षकविहीन होते जा रहे थे।
शासन ने इसे न केवल अनुशासनहीनता माना,
बल्कि इसे शिक्षा व्यवस्था की जड़ों में दीमक की तरह बताया।
आदेश में कहा गया —
1️⃣ शासन की अनुमति के बिना किसी भी अधिकारी, शिक्षक या कर्मचारी की संलग्नता तत्काल निरस्त की जाए।
2️⃣ भविष्य में कोई भी अधिकारी या अधीनस्थ अपने स्तर से संलग्न आदेश जारी नहीं करेगा।
3️⃣ महानिदेशक स्कूल शिक्षा को आदेश — 10 दिन में पूरी स्थिति की रिपोर्ट शासन को सौंपें।
‘संलग्नता संस्कृति’ कैसे बनी सिरदर्द
- शिक्षा विभाग में वर्षों से यह प्रथा चली आ रही थी कि प्रभावशाली या पहुंच रखने वाले कर्मचारी “संलग्नता आदेश” के जरिए अपने मनपसंद स्थानों पर तैनात हो जाते थे।
- कई अध्यापक शहरों में वर्षों से टिके हुए थे जबकि ग्रामीण विद्यालयों में कक्षाएं खाली पड़ी रहती थीं।
- अफसरशाही में यह एक “छिपा हुआ तबादला तंत्र” बन चुका था — न कोई नियम, न कोई पारदर्शिता।
अब शासन ने इस पर सीधे ब्रेक लगाने का काम किया है।
अपर मुख्य सचिव बोले — “शासन की अनुमति के बिना कोई आदेश मान्य नहीं”
अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने आदेश जारी करते हुए साफ कहा,
“यह देखा गया है कि कुछ अधिकारी अपने विवेक से शिक्षकों और कर्मचारियों को अन्यत्र भेज रहे हैं, जो पूरी तरह अस्वीकार्य है। सभी ऐसे आदेश निरस्त किए जाएं और कर्मचारी अपने मूल स्थानों पर लौटें।”
उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में यदि किसी ने यह गलती दोहराई तो विभागीय कार्रवाई तय होगी।
जिलों में बढ़ी हलचल, शुरू हुआ दस्तावेजों का ऑडिट
जैसे ही यह आदेश जिलों तक पहुंचा,
डीआईओएस (जिला विद्यालय निरीक्षक) और बीएसए (बेसिक शिक्षा अधिकारी) के कार्यालयों में खलबली मच गई।
अधिकारियों ने आनन-फानन में फाइलें खंगालनी शुरू कर दी हैं कि
किन-किन शिक्षकों और कर्मचारियों को बिना शासन अनुमति के संलग्न किया गया है।
कई जगहों पर तो कर्मचारियों ने “वापसी के लिए आवेदन” देना शुरू कर दिया है,
ताकि कार्रवाई की जद में आने से बचा जा सके।
शिक्षा विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
शिक्षा नीति विशेषज्ञ इसे एक ऐतिहासिक कदम मान रहे हैं।
उनका कहना है कि —
“यह फैसला शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा देगा। अब दूरदराज के स्कूलों में भी शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ेगी, और शहरों में कर्मचारियों की भीड़ कम होगी।”
“अगर इसे जमीन पर लागू किया गया, तो यह उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता का नया अध्याय साबित होगा।”
💬 जनता और शिक्षकों की राय
- ग्रामीण इलाकों के अभिभावक: “अब शायद हमारे बच्चों को भी पूरे साल पढ़ाई मिले।”
- शहरों के कुछ शिक्षक: “यह आदेश थोड़ा कठोर है, लेकिन व्यवस्था सुधार के लिए जरूरी।”
- जिलास्तरीय कर्मचारी: “अब मनपसंद पोस्टिंग के दिन खत्म, कामकाज का दबाव बढ़ेगा।”
निष्कर्ष: शिक्षा विभाग में ‘अनुशासन की घंटी’ बज गई है
उत्तर प्रदेश शासन का यह कदम साफ संदेश देता है —
“अब बिना अनुमति के एक भी कदम नहीं।”
यह आदेश न सिर्फ व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की पहल है, बल्कि यह बताता है कि शासन अब ढिलाई और मनमानी के युग को खत्म करने के मूड में है।











