यूपी में बिजलीकर्मियों का संग्राम
ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन की गतिविधियों पर उठा सवाल, 268वें दिन भी जारी विरोध
- संघर्ष समिति ने कहा – निजी घरानों के हित साधने का प्रयास निंदनीय
- डॉ. आशीष गोयल पर हितों के टकराव का आरोप
- “बिना अनुमति करोड़ों का चंदा”, CAG से ऑडिट कराने की मांग
- वाराणसी से लेकर अनपरा तक व्यापक विरोध प्रदर्शन

पूरी रिपोर्ट
लखनऊ, 22 अगस्त 2025।
उत्तर प्रदेश में बिजलीकर्मियों का निजीकरण विरोधी आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन की गतिविधियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं और सरकार से इसकी तत्काल जांच की मांग की है। समिति का आरोप है कि यह एसोसिएशन निजी घरानों के हित में कार्य कर रही है और संविधानेतर गतिविधियों के माध्यम से निजीकरण की राह आसान बनाने का प्रयास कर रही है।
संघर्ष समिति के आरोप
- नवंबर 2024 में लखनऊ में हुई बैठक में निजी घरानों की मिलीभगत से एसोसिएशन सक्रिय हुई।
- इसमें विद्युत वितरण निगमों के चेयरमैन, एमडी और निजी घरानों के सीईओ शामिल हैं।
- डायरेक्टर जनरल: आलोक कुमार (पूर्व IAS, पूर्व अध्यक्ष UPPCL एवं पूर्व विद्युत सचिव भारत सरकार)।
- जनरल सेक्रेटरी: डॉ. आशीष गोयल (वर्तमान अध्यक्ष, UPPCL)।
- कोषाध्यक्ष: एक बड़े निजी घराने के सीईओ।
संघर्ष समिति का आरोप है कि डॉ. गोयल का UPPCL अध्यक्ष रहते हुए इस तरह निजी घरानों के साथ जुड़ना सरकारी गोपनीयता का हनन और हितों का टकराव है।
चंदे पर सवाल
- आरोप है कि देशभर के डिस्कॉम से एसोसिएशन करोड़ों रुपए का चंदा वसूल रही है।
- चर्चा है कि UPPCL ने भी कई करोड़ रुपए का चंदा दिया है।
- समिति की मांग: “CAG से ऑडिट कराया जाए और पता लगाया जाए कि यह संगठन किस उद्देश्य से बना और किस मद से चंदा दिया जा रहा है।”
गंभीर आरोप
- आलोक कुमार पर आरोप कि वे अनौपचारिक बैठकें लेकर अफसरों को निजीकरण की प्रक्रिया तेज करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
- संघर्ष समिति का कहना: “सरकारी अनुमति के बिना बना संगठन पूरी तरह अनैतिक और अनुचित है।”
- यह गतिविधियाँ पूर्व व वर्तमान अधिकारियों और निजी घरानों की मिलीभगत से हो रही हैं।
प्रदेशव्यापी विरोध
संघर्ष समिति के आह्वान पर आंदोलन लगातार 268वें दिन भी जारी रहा।
आज जिन प्रमुख स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुआ:
- वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, अलीगढ़, बरेली, मथुरा, झांसी, अयोध्या, नोएडा, गाजियाबाद, मुरादाबाद, पिपरी, अनपरा समेत दर्जनों शहर।
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
- यह विवाद केवल निजीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि पारदर्शिता और हितों के टकराव का बड़ा मुद्दा बन गया है।
- यदि आरोप सही हैं तो यह प्रशासनिक आचरण और संस्थागत ईमानदारी पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
- लगातार 268 दिनों से जारी विरोध यह दिखाता है कि बिजलीकर्मी किसी भी कीमत पर निजीकरण के खिलाफ अडिग हैं।
- यह संघर्ष आगे चलकर प्रदेश सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन सकता है।
निचोड़
उत्तर प्रदेश में बिजलीकर्मियों का आंदोलन अब सिर्फ “निजीकरण” बनाम “सरकारीकरण” का मुद्दा नहीं रह गया है। यह मामला अब प्रणाली की पारदर्शिता, अफसरों की भूमिका और निजी घरानों की पैठ का प्रतीक बन गया है। आने वाले दिनों में यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है।
क्या यूपी सरकार इन आरोपों पर संज्ञान लेगी या मामला सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रहेगा? यह देखने वाली बात होगी।












