उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण पर विवाद: संघर्ष समिति ने बिडिंग को बताया अवैधानिक, विरोध तेज


लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उप्र ने पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के लिए ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट नियुक्त करने की बिडिंग को अवैध करार देते हुए इसे तत्काल निरस्त करने की मांग की है। संघर्ष समिति का दावा है कि इस प्रक्रिया में गड़बड़ियां की गई हैं, जिससे भारी घोटाले की आशंका है।
बिडिंग प्रक्रिया पर गंभीर आरोप
संघर्ष समिति के अनुसार, ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट नियुक्त करने की बिडिंग में आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) दस्तावेज में बार-बार बदलाव किया गया। सबसे गंभीर आरोप यह है कि इसमें “कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट” से जुड़े महत्वपूर्ण प्रावधानों को हटा दिया गया। समिति ने आरोप लगाया कि जो तीन कंपनियां बिड में शामिल हुई हैं, वे सभी हितों के टकराव (Conflict of Interest) के दायरे में आती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि बिडिंग में धांधली की गई है और निजीकरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है।
115वें दिन भी जारी रहा विरोध प्रदर्शन
बिजली कर्मचारियों का यह आंदोलन लगातार 115वें दिन भी जारी रहा। प्रदेशभर में वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, गोरखपुर, प्रयागराज, मथुरा, अलीगढ़, झांसी, बरेली, देवीपाटन, अयोध्या सहित कई जिलों में कर्मचारियों ने विरोध सभाएँ कीं। कर्मचारियों का कहना है कि सरकार निजीकरण के नाम पर बिजली वितरण को मुनाफाखोरी की ओर धकेल रही है, जिससे न केवल बिजली कर्मियों की नौकरी पर संकट आएगा बल्कि उपभोक्ताओं को भी महंगी बिजली का सामना करना पड़ेगा।
पूर्वोत्तर भारत से मिला समर्थन
इस बीच, गुवाहाटी में पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों के बिजली कर्मचारी संगठनों ने उत्तर प्रदेश के आंदोलन को अपना समर्थन दिया है। सम्मेलन में पारित प्रस्ताव में मांग की गई कि उत्तर प्रदेश सरकार को निजीकरण का फैसला तुरंत वापस लेना चाहिए। पूर्वोत्तर के संगठनों ने यह चेतावनी भी दी कि यदि उत्तर प्रदेश के बिजली कर्मियों का उत्पीड़न हुआ तो वे भी आंदोलन में उतरने को मजबूर होंगे। इतना ही नहीं, 9 अप्रैल को लखनऊ में होने वाली रैली में पूर्वोत्तर भारत के बिजली कर्मचारी भी शामिल होंगे।
मेरठ में ‘बिजली महापंचायत’ की तैयारी
संघर्ष समिति ने 24 मार्च को मेरठ में “बिजली महापंचायत” आयोजित करने का निर्णय लिया है, जिसके लिए 22 और 23 मार्च को बिजली उपभोक्ताओं और किसानों के बीच जनसंपर्क अभियान चलाया जा रहा है। महापंचायत का उद्देश्य उपभोक्ताओं को निजीकरण के संभावित प्रभावों के प्रति जागरूक करना और सरकार पर दबाव बनाना है।
क्या है कर्मचारियों की मुख्य मांगें?
- ट्रांजैक्शन कंसल्टेंट की नियुक्ति के लिए की गई बिडिंग को तत्काल निरस्त किया जाए।
- प्रदेश में बिजली वितरण के निजीकरण की प्रक्रिया को पूरी तरह से रोका जाए।
- बिजली कर्मचारियों के वेतन, सुविधाओं और नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
- निजीकरण से उपभोक्ताओं पर बढ़ने वाले आर्थिक बोझ को कम किया जाए।
सरकार का रुख और आगे की स्थिति
अब तक सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है, लेकिन अगर विरोध तेज होता है तो सरकार पर दबाव बढ़ सकता है। पूर्वोत्तर राज्यों के समर्थन से यह आंदोलन और भी व्यापक रूप ले सकता है। अगर सरकार समय रहते बिजली कर्मियों से संवाद नहीं करती तो आने वाले दिनों में यह मामला और गरमा सकता है, जिससे प्रदेश में बिजली आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।
(विश्लेषण: बिजली निजीकरण का यह मुद्दा केवल कर्मचारियों का नहीं, बल्कि आम उपभोक्ताओं से भी जुड़ा हुआ है। सरकार को चाहिए कि वह जल्द से जल्द इस विवाद का समाधान निकाले, ताकि बिजली व्यवस्था और औद्योगिक क्षेत्र पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।)











