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बिजली कर्मचारियों का 100 दिन से जारी आंदोलन: निजीकरण के खिलाफ संघर्ष तेज करने की तैयारी

बिजली कर्मचारियों का 100 दिन से जारी आंदोलन: निजीकरण के खिलाफ संघर्ष तेज करने की तैयारी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों का निजीकरण के विरोध में चल रहा आंदोलन आज 100वें दिन में प्रवेश कर गया। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के नेतृत्व में प्रदेश भर के बिजलीकर्मी बिना कामकाज बाधित किए, भोजन अवकाश या कार्यालय समय के बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन की लंबी अवधि के बावजूद प्रबंधन और सरकार की चुप्पी ने कर्मचारियों में आक्रोश बढ़ा दिया है।

संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इतने लंबे विरोध के बावजूद प्रबंधन ने अब तक वार्ता के लिए कोई पहल नहीं की है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रबंधन हठधर्मिता दिखा रहा है, जबकि कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए ही आंदोलन कर रहे हैं।

संघर्ष के साथ सुधार का मंत्र
संघर्ष समिति ने यह स्पष्ट किया है कि उनका संघर्ष केवल विरोध के लिए नहीं है, बल्कि वे “सुधार और संघर्ष” की नीति पर चलते हैं। इसका उदाहरण हाल ही में महाकुंभ में हुई उत्कृष्ट बिजली आपूर्ति और ओटीएस (वन टाइम सेटलमेंट) अभियान की सफलता है। मार्च के महीने में भी कर्मचारी राजस्व वसूली के रिकॉर्ड बनाने के लिए मेहनत कर रहे हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि उनकी लड़ाई केवल अपनी मांगों के लिए नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं देने के लिए भी है।

आंदोलन की अगली रणनीति पर मंथन
संघर्ष समिति की अगली बैठक 8 मार्च को लखनऊ में बुलाई गई है, जिसमें केंद्रीय पदाधिकारी, विभिन्न जिलों और परियोजनाओं के संयोजक और सह-संयोजक शामिल होंगे। इस बैठक में 100 दिनों के आंदोलन की समीक्षा की जाएगी और आगे की रणनीति पर निर्णय लिया जाएगा। संभावना है कि यदि वार्ता के लिए जल्द कोई पहल नहीं होती, तो आंदोलन को और उग्र रूप दिया जा सकता है।

प्रदेशभर में व्यापक विरोध
लखनऊ के अलावा वाराणसी, कानपुर, मेरठ, आगरा, गोरखपुर, प्रयागराज, मथुरा, झांसी, बरेली, अलीगढ़ और अन्य जिलों में भी बिजली कर्मियों ने विरोध सभा की। यह दिखाता है कि आंदोलन प्रदेशव्यापी है और कर्मचारियों के भीतर एकता मजबूत है।

क्या होगा आगे?
100 दिन का शांतिपूर्ण प्रदर्शन जहां कर्मचारियों की अनुशासित प्रतिबद्धता को दर्शाता है, वहीं प्रबंधन की चुप्पी भविष्य में टकराव की आशंका को भी जन्म देती है। अगर 8 मार्च की बैठक में संघर्ष को तेज करने का निर्णय लिया गया, तो यह आंदोलन प्रदेश की बिजली आपूर्ति व्यवस्था को गहरे स्तर पर प्रभावित कर सकता है।

सरकार और प्रबंधन के सामने अब एक बड़ा सवाल 

क्या वे बिजली कर्मचारियों के धैर्य की परीक्षा लेते रहेंगे, या बातचीत की पहल करके एक समाधान की ओर कदम बढ़ाएंगे? जवाब जो भी हो, इतना तो तय है कि उत्तर प्रदेश में बिजली आंदोलन की यह लड़ाई आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।

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