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बिजनौर: शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार पर प्रशासन की कड़ी कार्रवाई, बड़े अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल

बिजनौर: शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार पर प्रशासन की कड़ी कार्रवाई, बड़े अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल

BIJNOR. बिजनौर में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत गरीब बच्चों के प्रवेश में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार का मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई की है। निजी स्कूलों में गरीब बच्चों के एडमिशन कराने के नाम पर रिश्वत लेने के दोषी संविदा कर्मी बीपी मीणा की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। इसके अलावा, बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के बाबू तौकीर को भी रिश्वत लेने के आरोप में निलंबित किया गया था।

हालांकि, इन मामलों ने एक बड़े प्रश्न को जन्म दिया है—क्या यह भ्रष्टाचार केवल निचले स्तर तक सीमित है, या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश छिपी हुई है?

DIOS जय करण यादव के कार्यालय में रिश्वतखोरी, वरिष्ठ सहायक रंगे हाथ गिरफ्तार

शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका एक और प्रमाण हाल ही में तब मिला जब जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) जय करण यादव के कार्यालय में वरिष्ठ सहायक देवेंद्र चौहान को दस हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया। इससे पहले, मिड डे मील समन्वयक रासु चौहान को भी रिश्वत लेते पकड़ा गया था। संयोग यह है कि दोनों ही घटनाएं तब हुईं जब जय करण यादव बिजनौर के बीएसए (BSA) थे।

क्या केवल अधीनस्थ ही दोषी हैं ?

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब जय करण यादव शिक्षा विभाग के उच्च पदों पर थे, तब उनके ही अधीन कार्य करने वाले कर्मचारी बार-बार रिश्वत लेते पकड़े गए। क्या यह सिर्फ संयोग है, या फिर पूरा तंत्र भ्रष्टाचार में लिप्त है? यदि उनके अधीनस्थ लगातार रिश्वतखोरी में पकड़े जा रहे हैं, तो क्या यह संभव है कि उनके वरिष्ठ अधिकारी इससे अनभिज्ञ हों ?

जिलाधिकारी को लेना चाहिए बड़ा निर्णय

इस पूरे मामले में जिलाधिकारी को गहन विचार कर केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर ही नहीं, बल्कि उच्च अधिकारियों की भूमिका पर भी ध्यान देना चाहिए। यदि बार-बार रिश्वतखोरी की घटनाएं उन्हीं के कार्यकाल में हो रही हैं, तो यह संकेत करता है कि भ्रष्टाचार केवल नीचे तक सीमित नहीं, बल्कि ऊपर तक फैला हुआ है। यदि अधिकारी भ्रष्टाचार में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं भी हैं, तब भी उनकी निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

भ्रष्टाचार की जड़ें और सुधार के उपाय

शिक्षा विभाग में इस तरह के घोटालों को रोकने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

  • ऊपर से नीचे तक जांच: न केवल छोटे कर्मचारियों बल्कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
  • डिजिटलीकरण और पारदर्शिता: एडमिशन, मिड डे मील, अनुदान आदि से जुड़ी सभी प्रक्रियाओं को पूरी तरह से डिजिटल किया जाए ताकि रिश्वतखोरी की गुंजाइश खत्म हो।
  • सख्त दंड और कानूनी कार्रवाई: केवल निलंबन से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
  • नागरिक भागीदारी और शिकायत प्रणाली: शिक्षा में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को उजागर करने के लिए एक स्वतंत्र हेल्पलाइन और निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।

बिजनौर में शिक्षा विभाग में सामने आए भ्रष्टाचार के मामले बेहद चिंताजनक हैं। निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई की जा रही है, लेकिन उच्च अधिकारियों की भूमिका की भी गहन जांच होनी चाहिए। यदि डीआईओएस कार्यालय में रिश्वतखोरी हो रही है, तो इसकी जिम्मेदारी केवल अधीनस्थों तक सीमित नहीं रह सकती। जिलाधिकारी को इस पर संज्ञान लेते हुए दोषियों के खिलाफ कठोर निर्णय लेना चाहिए, ताकि शिक्षा प्रणाली को भ्रष्टाचार से मुक्त किया जा सके।

 

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