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कुप्रथा पर करारा प्रहार: झालू में सामाजिक बदलाव की बयार, मृत्युभोज बंद करने पर प्रबुद्धजनों ने जताई सहमति

कुप्रथा पर प्रहार: झालू में सामाजिक क्रांति की आहट! मृत्युभोज की फिजूलखर्ची रोकने को एकजुट हुआ समाज

कुप्रथा पर करारा प्रहार: झालू में सामाजिक बदलाव की बयार, मृत्युभोज बंद करने पर प्रबुद्धजनों ने जताई सहमति

संपादकीय विश्लेषण | targetTvLive रिपोर्ट: अवनीश त्यागी स्थान: झालू (बिजनौर)

शोक संतप्त परिवारों पर आर्थिक बोझ की ‘कुप्रथा’ पर कसेगा शिकंजा

झालू (बिजनौर): किसी अपने को खोने का असहनीय दुख और ऊपर से बिरादरी व समाज का सामाजिक दबाव—इसी दोहरे संकट से जूझते आम परिवारों को राहत देने के लिए कस्बा झालू में एक ऐतिहासिक और सराहनीय पहल की गई है।

शुक्रवार शाम कस्बा झालू के मोहल्ला चौधरियान स्थित धर्मशाला में प्रबुद्ध समाज की एक अहम बैठक का आयोजन किया गया। बैठक की अध्यक्षता चेतन सिंह ने की तथा मंच का सफल संचालन ज्ञानेश्वर सिंह द्वारा किया गया। इस बैठक का मुख्य एजेंडा समाज में वर्षों से चली आ रही ‘मृत्युभोज’ (तेरहवीं/दावत) जैसी कुप्रथा को समाप्त करना और लोगों को इसके दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करना था।

आर्थिक बदहाली और मानसिक तनाव का बड़ा कारण है मृत्युभोज

डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म targetTvLive के लिए विश्लेषण करते हुए अवनीश त्यागी की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, आधुनिक दौर में जहां समाज प्रगति की ओर बढ़ रहा है, वहीं मृत्युभोज जैसी परंपराएं मध्यकालीन सोच का प्रतीक बनी हुई हैं।

बैठक में उपस्थित वक्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

  • अतिरिक्त आर्थिक बोझ: परिवार के मुख्य सदस्य या किसी प्रियजन के निधन पर जहां परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है, वहीं सामाजिक दबाव में लाखों रुपये का कर्ज लेकर तेरहवीं या मृत्युभोज का आयोजन करना पड़ता है।
  • सामाजिक लोक-लाज का डर: अक्सर निर्धन और मध्यमवर्गीय परिवार केवल “लोग क्या कहेंगे” के डर से अपनी जमापूंजी गंवा देते हैं या महाजनों के कर्जदार बन जाते हैं।
  • बदलाव का संकल्प: बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अब समाज में इस परंपरा को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। दुखी परिवार को शोक की घड़ी में आर्थिक तंगी से बचाना ही सच्चे अर्थों में मानवीय धर्म है।

समाज में सकारात्मक सोच और जागरूकता की आवश्यकता

बैठक का मूल ध्येय समाज में एक सकारात्मक सोच विकसित करना, फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाना और आने वाली पीढ़ी को इस कुप्रथा के चंगुल से मुक्त कराना था। उपस्थित प्रबुद्धजनों ने संकल्प लिया कि वे स्वयं अपने परिवारों से इसकी शुरुआत करेंगे और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करेंगे।

बैठक में मुख्य रूप से उपस्थित प्रबुद्धजन:

इस सामाजिक सुधार की मुहिम में क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। बैठक में प्रमुख रूप से:

  • लाखन सिंह
  • ज्ञानेश्वर सिंह
  • कामेंद्र सिंह (किसान नेता)
  • मुनेन्द्र सिंह
  • मनोज कुमार
  • संजीव प्रधान
  • ओमपाल सिंह
  • कृष्ण गोपाल सिंह
  • गौरव शर्मा

सहित कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ता एवं ग्रामीण मौजूद रहे।

targetTvLive का दृष्टिकोण (Analytic Overview)

अवनीश त्यागी का विश्लेषणात्मक नज़रिया: समाज में बदलाव कभी भी सरकारी कानूनों से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और स्वयं के संकल्प से आता है। झालू के चौधरियान धर्मशाला से उठी यह आवाज सिर्फ एक कस्बे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में इसी प्रकार के सामूहिक निर्णय लिए जाएं, तो लाखों परिवारों को कर्ज और मानसिक तनाव के दलदल में धंसने से बचाया जा सकता है। झालू समाज की यह पहल अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगी।

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