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CM की कुर्सी ठुकराने वाले ‘गुर्जर गांधी’ रामचंद्र विकल की पुण्यतिथि, एक दिन पहले बेटे के निधन से भावुक हुआ पश्चिमी यूपी

‘गुर्जर गांधी’ रामचंद्र विकल की पुण्यतिथि आज: सिद्धांतों, किसान हित और सादगी की राजनीति का अमिट अध्याय

पूर्व उपमुख्यमंत्री रामचंद्र विकल को श्रद्धांजलि, पुत्र जगवीर सिंह विकल के निधन से इस वर्ष पुण्यतिथि बनी और अधिक भावुक

By: एम पी सिंह| TargetTvLive

अमरोहा, 26 जून। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सादगी, सिद्धांतों और किसान हितैषी नेतृत्व के पर्याय माने जाने वाले ‘गुर्जर गांधी’ चौधरी रामचंद्र विकल की आज पुण्यतिथि है। इस वर्ष उनकी पुण्यतिथि ऐसे समय पर आई है, जब उनके पुत्र एवं पूर्व विधायक/एमएलसी चौधरी जगवीर सिंह विकल का 24 जून को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। 25 जून को उनका अंतिम संस्कार पैतृक स्थान पर किया गया। ऐसे में विकल परिवार और उनके समर्थकों के लिए यह अवसर श्रद्धांजलि के साथ-साथ गहरे भावनात्मक क्षण भी लेकर आया।

स्वतंत्रता सेनानी से किसान नेता तक का सफर

8 नवंबर 1916 को जन्मे चौधरी रामचंद्र विकल स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और आर्य समाज की विचारधारा से प्रभावित रहे। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन किसानों, मजदूरों और ग्रामीण समाज के मुद्दों को समर्पित किया। वे वर्ष 1952 से 1971 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे, बाद में बागपत से लोकसभा सांसद तथा 1984 से 1990 तक राज्यसभा सदस्य भी रहे।

1967: उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऐतिहासिक मोड़

वर्ष 1967 में उत्तर प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन के दौरान रामचंद्र विकल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार वे संयुक्त विधायक दल के प्रमुख नेताओं में थे और बाद में चौधरी चरण सिंह सरकार में उपमुख्यमंत्री तथा कृषि, सिंचाई, वन, पशुपालन सहित कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री बने।

यह दावा कि उन्होंने मुख्यमंत्री बनने का अवसर छोड़कर चौधरी चरण सिंह का समर्थन किया, कई राजनीतिक संस्मरणों और क्षेत्रीय ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है। हालांकि इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक सरकारी अभिलेख सीमित हैं। इसलिए इसे राजनीतिक इतिहास की प्रचलित व्याख्या के रूप में देखा जाता है, न कि निर्विवाद सरकारी तथ्य के रूप में।

किसानों के लिए किए उल्लेखनीय कार्य

रामचंद्र विकल ने सिंचाई दरों में राहत, भूमि राजस्व में छूट तथा ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और आधारभूत ढांचे के विकास के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए। सार्वजनिक अभिलेखों के अनुसार उन्होंने अनेक प्राथमिक विद्यालयों, महाविद्यालयों, कृषि विश्वविद्यालयों तथा अन्य विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किसान हितों के प्रति उनके समर्पण के कारण उन्हें जनता ने सम्मानपूर्वक ‘गुर्जर गांधी’ की उपाधि दी।

राजनीतिक विरासत आज भी प्रासंगिक

आज जब राजनीति में सिद्धांतों और सार्वजनिक जीवन की शुचिता पर बहस होती है, तब रामचंद्र विकल का जीवन एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में किसान, ग्रामीण विकास और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका नाम आज भी सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है।

इस वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर पुत्र चौधरी जगवीर सिंह विकल के हालिया निधन ने श्रद्धांजलि को और अधिक भावुक बना दिया है। क्षेत्र के अनेक सामाजिक, किसान और राजनीतिक संगठनों ने दोनों नेताओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी जनसेवा की विरासत को याद किया।

(यह समाचार उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों, संसदीय विवरणों और ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर तथ्य-सत्यापित रूप में तैयार किया गया है।)

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