Target Tv Live

25 जून का सच: पहले आपातकाल ने दबाई थी आवाज, अब सुविधाओं के अभाव में जूझ रहे हैं पत्रकार

25 जून का सच: फिरोज गांधी ने प्रेस को दी आज़ादी, आपातकाल ने छीनी आवाज़, अब सुविधाओं के अभाव में जूझ रहे पत्रकार

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कहानी—संघर्ष, साहस और उपेक्षा की दास्तान
महीपाल सिंह । TargetTvLive

अमरोहा, 25 जून। भारत में पत्रकारिता का इतिहास केवल खबरों का इतिहास नहीं है, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले संघर्षों का इतिहास भी है। एक समय ऐसा था जब संसद की कार्यवाही को सच-सच प्रकाशित करने पर पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई का खतरा बना रहता था। तब पूर्व सांसद फिरोज गांधी ने पहल करते हुए ऐसा कानून बनवाया, जिसने पत्रकारों को संसद की निष्पक्ष और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग का अधिकार दिलाया। यह कदम लोकतंत्र में पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना गया।

लेकिन इस गौरवशाली यात्रा पर 25 जून 1975 को ऐसा ग्रहण लगा, जिसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय कहा जाता है।

जब अखबारों की स्याही पर भी पहरा बैठ गया था

25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ। इसके साथ ही प्रेस की स्वतंत्रता पर भी ताला लग गया। अखबारों को खबरें छापने से पहले सरकारी सेंसर की अनुमति लेनी पड़ती थी। सच लिखने वाले पत्रकारों को जेल भेज दिया गया। कई अखबारों ने विरोध में अपने संपादकीय पृष्ठ खाली छोड़ दिए ताकि देश समझ सके कि लोकतंत्र की आवाज़ को दबाया जा रहा है।

वह दौर आज भी याद दिलाता है कि जब प्रेस स्वतंत्र नहीं रहती, तब जनता तक सच पहुंचना मुश्किल हो जाता है।

आज कोई सेंसरशिप नहीं, लेकिन क्या पत्रकार वास्तव में स्वतंत्र हैं?

समय बदला, सरकारें बदलीं, तकनीक बदली, लेकिन पत्रकारों की चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। आज खतरा अलग रूप में सामने है।

उत्तर प्रदेश के अमरोहा सहित कई जिलों में मान्यता प्राप्त पत्रकारों को मिलने वाली रेल किराया छूट जैसी सुविधाएं समाप्त हो चुकी हैं। पत्रकार संगठनों का कहना है कि यह केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि उनके कामकाज को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण मुद्दा है।

इसके साथ ही कई अन्य समस्याएं भी लगातार बनी हुई हैं—

– पत्रकार कल्याण योजनाओं का सीमित लाभ
– सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का अभाव
– कैशलेस चिकित्सा सुविधा नहीं
– पेंशन व्यवस्था का अभाव
– जिला स्तरीय स्थायी समितियों की अनियमित बैठकें
– जनहित की खबरों पर अपेक्षित प्रशासनिक कार्रवाई का अभाव

गांव, कस्बे और जिले का पत्रकार सबसे ज्यादा संघर्ष में

राष्ट्रीय चैनलों और बड़े मीडिया संस्थानों की चमक के बीच जिला और तहसील स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों की चुनौतियां अक्सर चर्चा में नहीं आ पातीं।

यही पत्रकार गांवों की समस्याएं, भ्रष्टाचार, जनसुविधाओं की कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक खामियों को सामने लाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि सबसे ज्यादा जोखिम उठाने वाला यही वर्ग सबसे कम सुविधाएं प्राप्त कर पाता है।

इतिहास से सबक लेने की जरूरत

आपातकाल में प्रेस की आवाज़ को सीधे दबाया गया था। आज परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन पत्रकारों के सामने आर्थिक असुरक्षा, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक उदासीनता जैसी चुनौतियां खड़ी हैं।

लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब पत्रकार बिना भय, बिना दबाव और बिना आर्थिक संकट के जनता की आवाज़ को शासन तक पहुंचा सकें।

बड़ा सवाल: क्या चौथे स्तंभ को उसका सम्मान मिल रहा है?

आज 25 जून की तारीख केवल आपातकाल की याद नहीं दिलाती, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि जिन पत्रकारों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया, क्या आज उनकी नई पीढ़ी को पर्याप्त सम्मान, सुरक्षा और सुविधाएं मिल रही हैं?

फिरोज गांधी ने पत्रकारिता को कानूनी ताकत दी थी। आपातकाल ने उसकी अहमियत समझाई थी। अब समय की मांग है कि सरकारें, प्रशासन और संबंधित संस्थाएं पत्रकारों की वास्तविक समस्याओं को गंभीरता से सुनें।

क्योंकि यदि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को लगातार कमजोर किया जाएगा, तो इसका असर केवल पत्रकारों पर नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र पर पड़ेगा।

#Hashtags

#TargetTvLive #PressFreedom #Emergency1975 #FerozeGandhi #JournalistRights #MediaFreedom #Democracy #HindiNews #AmrohaNews #DistrictJournalists #PressCouncil #FreedomOfExpression #UPNews #लोकतंत्र #पत्रकारिता #आपातकाल #प्रेस_स्वतंत्रता #जिला_पत्रकार #अमरोहा

Leave a Comment

यह भी पढ़ें