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गर्मी, दूरी और डर… आखिर क्यों छात्राओं को घर से दूर भेज रहा विश्वविद्यालय?

समर्थ पोर्टल का साइड इफेक्ट!

गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय की बेटियां घर से दूर परीक्षा देने को मजबूर, उठे बड़े सवाल

“जब दूसरे विश्वविद्यालय करा सकते थे होम सेंटर परीक्षा, तो मुरादाबाद विश्वविद्यालय क्यों फेल?” छात्राओं में आक्रोश, अभिभावकों की बढ़ी चिंता

मुरादाबाद। डिजिटल शिक्षा व्यवस्था और सरकारी पोर्टलों के दम पर शिक्षा सुधार के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर दिखा रही है। गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद में इस बार परीक्षा व्यवस्था को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है जिसने हजारों छात्राओं और उनके परिवारों की चिंता बढ़ा दी है।

विश्वविद्यालय की बालिकाएं गृह परीक्षा केंद्र (होम सेंटर) की सुविधा से वंचित रह गई हैं और अब उन्हें कई किलोमीटर दूर जाकर परीक्षा देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। भीषण गर्मी, लंबी दूरी, सुरक्षा की चिंता और परिवहन की दिक्कतों के बीच छात्राओं का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब प्रदेश के कई अन्य विश्वविद्यालय “समर्थ पोर्टल” की प्रक्रिया के बीच भी छात्राओं को गृह परीक्षा सुविधा देने में सफल रहे, तो आखिर गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय ऐसा क्यों नहीं कर पाया?

“समर्थ पोर्टल के निर्देशों के कारण आई दिक्कत” —कुलपति सचिन माहेश्वरी

विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय मुरादाबाद के कुलपति सचिन माहेश्वरी ने कहा कि सरकार के समर्थ पोर्टल के उपयोग संबंधी निर्देशों को लागू करने की प्रक्रिया में इस बार बालिकाओं को गृह परीक्षा नियम का लाभ नहीं मिल सका।

उन्होंने माना कि अन्य विश्वविद्यालय इस चुनौती के बावजूद होम सेंटर व्यवस्था लागू करने में सफल रहे, लेकिन यहां तकनीकी और प्रशासनिक समन्वय में समस्या आने से छात्राओं को दूर केंद्रों पर परीक्षा देने की स्थिति बनी।

हालांकि प्रशासन अब सफाई देने और भरोसा दिलाने में जुटा हुआ है।

“सुरक्षा की चिंता न करें” — प्रशासन का दावा

सचिन माहेश्वरी ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने क्षेत्र के जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों से बातचीत कर ली है। परीक्षा अवधि के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सभी आवश्यक निर्देश दिए गए हैं ताकि किसी भी छात्रा को परेशानी का सामना न करना पड़े।

उन्होंने कहा कि यदि किसी छात्रा को परीक्षा केंद्र तक पहुंचने में कोई कठिनाई है तो संबंधित विद्यालय विश्वविद्यालय को अवगत कराएं। जरूरत पड़ने पर विशेष वाहन व्यवस्था भी उपलब्ध कराई जाएगी।

लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि जब पहले से समस्या स्पष्ट थी, तो समाधान परीक्षा से ठीक पहले क्यों नहीं खोजा गया?

अभिभावकों में डर, छात्राओं में नाराजगी

ग्रामीण और कस्बाई इलाकों की छात्राओं के लिए यह फैसला सबसे ज्यादा परेशानी भरा साबित हो रहा है। कई छात्राओं को सुबह तड़के घर से निकलना पड़ रहा है, जबकि कुछ को दूसरे जिलों या दूरदराज क्षेत्रों तक सफर करना पड़ रहा है।

अभिभावकों का कहना है कि बेटियों की सुरक्षा को लेकर डर बना हुआ है। गर्मी, लंबी दूरी और सार्वजनिक परिवहन की अनिश्चितता ने चिंता को और बढ़ा दिया है।

कई छात्राओं का कहना है कि परीक्षा की तैयारी से ज्यादा मानसिक दबाव अब परीक्षा केंद्र तक पहुंचने को लेकर है।

शिक्षा व्यवस्था पर खड़े हुए गंभीर सवाल

इस पूरे मामले ने प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • क्या तकनीकी पोर्टल छात्रों की सुविधा के लिए हैं या नई परेशानियां पैदा करने के लिए?
  • जब दूसरे विश्वविद्यालय समाधान निकाल सकते थे, तो मुरादाबाद विश्वविद्यालय क्यों नहीं?
  • क्या छात्राओं की सुरक्षा और सुविधा को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी गई?
  • क्या डिजिटल सिस्टम लागू करने से पहले जमीनी तैयारियां पूरी थीं?

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी तकनीकी व्यवस्था की सफलता का पैमाना छात्रों की सुविधा होनी चाहिए। यदि व्यवस्था छात्राओं को मानसिक और शारीरिक परेशानी में डाल दे, तो उस पर पुनर्विचार जरूरी हो जाता है।

“अगले वर्ष नहीं होगी ऐसी समस्या” — विश्वविद्यालय की गारंटी

विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब भविष्य के लिए भरोसा दिया है कि अगले वर्ष इस तरह की स्थिति दोबारा उत्पन्न नहीं होगी। समर्थ पोर्टल और परीक्षा प्रबंधन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाएगा ताकि छात्राओं को घर से दूर परीक्षा देने की मजबूरी न झेलनी पड़े।

लेकिन फिलहाल छात्राओं और अभिभावकों का कहना है कि उन्हें भविष्य के आश्वासन नहीं, वर्तमान की राहत चाहिए।

छात्र संगठनों ने उठाई आवाज

इस मुद्दे को लेकर छात्र संगठनों और सामाजिक संगठनों में भी नाराजगी दिखाई देने लगी है। कई लोगों ने मांग की है कि छात्राओं के लिए नजदीकी परीक्षा केंद्र बनाए जाएं और परिवहन सुविधा की जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि उसका प्रभाव जमीन पर भी दिखाई दे।

अब परीक्षा से बड़ी चुनौती बना सफर

एक ओर सरकार “बेटी पढ़ाओ” और महिला शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर छात्राओं को परीक्षा देने के लिए लंबा और असुरक्षित सफर तय करना पड़ रहा है।

गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय का यह मामला अब केवल परीक्षा केंद्र बदलने का मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता, प्रशासनिक तैयारी और महिला सुरक्षा के दावों की भी परीक्षा बन गया है।

अवनीश त्यागी
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