नसबंदी कैंप में शर्मनाक आरोप! ओटी रूम में बाहरी पुरुष बुलाने का दावा, DM से शिकायत
“महिला होने पर शर्मिंदा किया गया”, डॉक्टरों पर अभद्रता और शोषण के गंभीर आरोप, कार्रवाई न हुई तो ठप होगा नसबंदी अभियान
बिजनौर। जनपद के सीएचसी हल्दौर में आयोजित नसबंदी कैंप अब बड़े विवाद में बदलता नजर आ रहा है। आशा हेल्थ वर्कर्स एसोसिएशन ने स्वास्थ्य विभाग के दो डॉक्टरों पर महिला लाभार्थियों और आशा कार्यकर्ताओं के साथ अभद्र व्यवहार, मानसिक उत्पीड़न और शारीरिक शोषण जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। मामले को लेकर जिलाधिकारी को शिकायत पत्र सौंपा गया है, जिससे स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है।
आरोप इतने गंभीर हैं कि अब यह मामला सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि महिला सम्मान और सरकारी व्यवस्थाओं पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
“नसबंदी कैंप में हुआ अपमान, विरोध करने पर मिली धमकी”
आशा हेल्थ वर्कर्स एसोसिएशन की जिलाध्यक्ष संगीता देवी ने आरोप लगाया कि 19 मई 2026 को सीएचसी हल्दौर में नसबंदी कैंप चल रहा था। इसी दौरान डॉ. राजीव द्विवेदी ने लाभार्थियों के साथ अभद्र व्यवहार किया और मारपीट तक की नौबत आ गई।
जब आशा कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया तो एमओआईसी डॉ. जितेन्द्र कुमार ने कथित तौर पर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिससे महिलाएं खुद को अपमानित महसूस करने लगीं। शिकायत में कहा गया कि महिलाओं को “महिला होने पर शर्मिंदा” किया गया।
ऑपरेशन थिएटर को लेकर भी गंभीर सवाल
शिकायत पत्र में यह भी दावा किया गया है कि नसबंदी प्रक्रिया के दौरान बाहरी पुरुषों को ओटी रूम में बुलाया गया। आरोप है कि इससे महिला लाभार्थियों की निजता भंग हुई और वे मानसिक रूप से प्रताड़ित महसूस करने लगीं।
आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब उन्होंने इस पर आपत्ति जताई तो उनके साथ भी दुर्व्यवहार किया गया।
“अब हल्दौर CHC में कोई नसबंदी नहीं कराएंगे”
मामले से नाराज आशा कार्यकर्ताओं ने साफ चेतावनी दी है कि यदि आरोपित डॉक्टरों को हटाकर कार्रवाई नहीं की गई तो वे आगे हल्दौर सीएचसी में किसी भी नसबंदी अभियान में सहयोग नहीं करेंगी।
यह चेतावनी स्वास्थ्य विभाग के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकती है, क्योंकि गांवों में परिवार नियोजन कार्यक्रम आशा कार्यकर्ताओं के सहयोग से ही सफल हो पाते हैं।
प्रशासन पर बढ़ा दबाव
आशा संगठन ने शिकायत की प्रतिलिपि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को भी भेजी है। ऐसे में अब जिला प्रशासन पर निष्पक्ष जांच और त्वरित कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकारी अस्पतालों में महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलेगी तो सरकारी योजनाओं पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ जाएगा।
जांच के बाद सामने आएगी सच्चाई
हालांकि समाचार लिखे जाने तक स्वास्थ्य विभाग या आरोपित डॉक्टरों की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया था। अब सभी की निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल बन सकता है।
रिपोर्ट: अवनीश त्यागी
प्रकाशन: TargetTvLive
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