कैदी की मौत के बाद हरकत में प्रशासन, NHRC गाइडलाइन के तहत होगी पूरी जांच
NDPS एक्ट में बंद था शानू, NHRC गाइडलाइन के तहत प्रशासन ने मांगे गवाह और सबूत
By Avnish Tyagi | TargetTvLive
बिजनौर, 20 मई 2026। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिला कारागार में बंद एक विचाराधीन कैदी की इलाज के दौरान मेरठ मेडिकल कॉलेज में मौत हो जाने के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। जिला प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दे दिए हैं। वहीं आम नागरिकों से भी इस मामले में साक्ष्य और बयान देने की अपील की गई है।
मृतक बंदी की पहचान मोहम्मद हसन उर्फ शानू पुत्र मोहम्मद अली निवासी नई बस्ती, थाना अमरोहा नगर, जनपद अमरोहा के रूप में हुई है। वह एनडीपीएस एक्ट के मामले में विचाराधीन कैदी था और 22 अप्रैल 2026 को न्यायालय के आदेश पर बिजनौर जिला कारागार में निरुद्ध किया गया था।
जेल में अचानक बिगड़ी तबीयत, पहले बिजनौर फिर मेरठ रेफर
प्रशासन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार बंदी ने 27 अप्रैल को बुखार, कमजोरी, उल्टी और चक्कर आने की शिकायत की थी। जेल चिकित्सालय में प्रारंभिक उपचार के बाद उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। चिकित्सकों ने उसे “Fever, Weakness, Vomiting, Dizziness, HCV Positive एवं Drug Addict” जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित बताया।
स्थिति गंभीर होने पर 30 अप्रैल को उसे जिला संयुक्त चिकित्सालय बिजनौर रेफर किया गया। वहां भी स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं होने पर चिकित्सकों ने 1 मई को मेरठ मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया।
बताया गया कि मेरठ मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान 2 मई 2026 की रात करीब 11:12 बजे डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
NHRC गाइडलाइन के तहत होगी गहन जांच
बंदी की मौत के बाद प्रशासन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशा-निर्देशों और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)-2023 की धारा 194 एवं 196 के तहत मजिस्ट्रियल जांच शुरू कर दी है।
जिला मजिस्ट्रेट बिजनौर ने 10 मई 2026 को उप जिलाधिकारी (न्यायिक) को मामले की जांच के लिए नामित किया है। डिप्टी कलेक्टर प्रिंस कुमार ने स्पष्ट किया कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से की जाएगी।
प्रशासन ने जनता से मांगे बयान और सबूत
जिला प्रशासन ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति के पास इस प्रकरण से जुड़ी कोई जानकारी, लिखित साक्ष्य या मौखिक बयान है तो वह प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित होने की तिथि से 15 दिनों के भीतर कलेक्ट्रेट स्थित शिकायत प्रकोष्ठ में पहुंचकर अपना पक्ष दर्ज करा सकता है।
इस कदम को प्रशासनिक पारदर्शिता और मानवाधिकार प्रक्रिया का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
सवालों के घेरे में जेल स्वास्थ्य व्यवस्था?
इस घटना के बाद एक बार फिर जेलों में स्वास्थ्य सुविधाओं और विचाराधीन बंदियों की चिकित्सा व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि गंभीर बीमारियों से पीड़ित बंदियों के लिए समय पर बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराना प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी है।
हालांकि प्रशासन का दावा है कि बंदी को समय पर इलाज और रेफरल की सुविधा उपलब्ध कराई गई, लेकिन अब सभी निगाहें मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं।
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