“तालियों से नहीं, तीखे सवालों से मजबूत होता है लोकतंत्र”
प्रेस की आज़ादी पर उठते सवालों के बीच जनपदीय पत्रकारिता भी दबाव और उपेक्षा से जूझ रही
महिपाल सिंह | विशेष लेख | TargetTvLive
मुरादाबाद/अमरोहा, 19 मई।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज बड़े सवालों के दौर से गुजर रही है। देश ही नहीं, दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता, सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। हाल ही में नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में भारतीय प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान एक विदेशी महिला पत्रकार द्वारा पूछे गए सवालों ने इस बहस को और गर्म कर दिया।
नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग ने भारत में प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में गिरावट और लंबे समय से खुली प्रेस वार्ता न होने को लेकर सवाल उठाए। इसके बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस छिड़ गई। एक पक्ष ने इसे लोकतंत्र में जरूरी सवाल बताया, तो दूसरे पक्ष ने इसे सुनियोजित एजेंडा करार दिया।
दरअसल, पत्रकारिता का मूल उद्देश्य ही सत्ता से सवाल करना और जनता तक सच पहुंचाना है। नॉर्वे जैसे देशों में प्रेस को खुलकर काम करने की आज़ादी है। यही वजह है कि प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नॉर्वे दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि भारत 157वें स्थान पर बताया जा रहा है। यह आंकड़ा अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
इस राष्ट्रीय बहस की गूंज अब उत्तर प्रदेश के जिलों तक साफ सुनाई दे रही है। जनपदीय पत्रकारों का कहना है कि अब अधिकारियों से तथ्यात्मक जानकारी लेना पहले की तुलना में काफी मुश्किल हो गया है। कई बार अधिकारियों के सीयूजी नंबर तक रिसीव नहीं होते और सरकारी पक्ष के बिना खबरों की पुष्टि करना चुनौती बन जाता है।
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि संवाद की जगह अब केवल एकतरफा सूचना व्यवस्था ने ले ली है। पत्रकार वार्ताएं कम होती जा रही हैं और जनप्रतिनिधियों से सीधा संवाद भी सीमित होता जा रहा है। इससे न केवल सूचना का अधिकार प्रभावित हो रहा है, बल्कि पत्रकारों में असुरक्षा और उपेक्षा की भावना भी बढ़ रही है।
जनपदीय पत्रकारिता के सामने एक और बड़ी चुनौती तथाकथित “मठाधीश पत्रकारिता” भी है। वर्षों से सत्ता और सुविधाओं के करीब बैठे कुछ प्रभावशाली लोगों ने पत्रकारिता के अवसरों पर कब्जा जमा रखा है। जबकि जमीनी स्तर पर काम करने वाले छोटे और ईमानदार पत्रकार संसाधनों और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे माहौल में समावेशी और निष्पक्ष पत्रकारिता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।
वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि पत्रकारिता केवल खबर दिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का आईना और उसकी चिकित्सा करने वाली व्यवस्था भी है। जब पत्रकार सवाल पूछना छोड़ देता है, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। आलोचनात्मक सोच और असहमति किसी भी स्वस्थ समाज की पहचान होती है।
लोकतंत्र केवल तालियों, प्रचार और इवेंट मैनेजमेंट से मजबूत नहीं होता। उसकी असली ताकत कठिन सवालों, पारदर्शिता और जवाबदेही में होती है। यदि सवाल पूछने की परंपरा खत्म हो गई, तो यह समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरनाक संकेत होगा।
आज जरूरत इस बात की है कि पत्रकारों को बिना डर, दबाव, सेंसरशिप और निगरानी के काम करने का सुरक्षित माहौल मिले, ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मजबूती के साथ खड़ा रह सके।
(लेखक: महिपाल सिंह, यूएनआई मुरादाबाद-अमरोहा
संवाददाता एवं मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति अमरोहा के जिलाध्यक्ष)
प्रस्तुति: TargetTvLive












