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लोककला की आड़ में अश्लीलता: संस्कृति पर संकट या आधुनिकता की मांग

लोककला की आड़ में अश्लीलता: संस्कृति पर संकट या आधुनिकता की मांग
अवनीश त्यागी, विश्लेषणात्मक रिपोर्ट

लेखक : प्रियंका सौरभ 

भारतीय लोककला और संगीत सदियों से समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य करते आए हैं। ये न केवल मनोरंजन का साधन रहे हैं, बल्कि समाज को नैतिकता, मूल्यों और परंपराओं का संदेश भी देते रहे हैं। परंतु वर्तमान परिदृश्य में लोककला और संस्कृति की आड़ में जिस प्रकार अश्लीलता परोसी जा रही है, उसने हमारी सांस्कृतिक धरोहर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

लोककला का पतन: जिम्मेदार कौन?

लोकगीतों और नृत्य शैलियों का उद्देश्य पारंपरिक लोकसंस्कृति को संजोना था, लेकिन अब यह बदल चुका है। आज सोशल मीडिया, यूट्यूब और टेलीविजन पर चल रहे अनेक गानों में जिस प्रकार द्विअर्थी संवाद, उत्तेजक नृत्य और फूहड़ता परोसी जा रही है, उसने लोककला की मूल भावना को आहत किया है। कई कलाकार ‘पब्लिक डिमांड’ का हवाला देकर इस अश्लीलता को सही ठहराते हैं। लेकिन क्या जनता वाकई ऐसी सामग्री देखना चाहती है, या यह एक कृत्रिम रूप से बढ़ावा दिया गया ट्रेंड है?

फिल्मों और एलबमों के निर्माण में निर्माता और निर्देशक अब केवल व्यूज, लाइक्स और मॉनेटाइजेशन के चक्कर में पड़े हुए हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस तथाकथित मनोरंजन का समाज और संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। गीतों में खुलेआम शराब, बंदूक, महिला वस्तुकरण और अनैतिक संबंधों का महिमामंडन किया जा रहा है, जिससे युवा पीढ़ी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

अश्लीलता और संस्कृति का टकराव

भारतीय संस्कृति हमेशा से सभ्यता और शालीनता की परिचायक रही है। ऐसे में लोकसंगीत और नृत्य में फूहड़ता का समावेश चिंताजनक है। लोककलाओं का संबंध ग्रामीण समाज और सांस्कृतिक परंपराओं से रहा है, लेकिन आधुनिक डिजिटल युग में इन पर व्यापारिक हित हावी हो चुके हैं।

अश्लीलता का यह बढ़ता चलन केवल यूट्यूब और सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक आयोजनों और पारिवारिक समारोहों तक भी पहुंच चुका है। शादी-विवाह जैसे पारंपरिक आयोजनों में भी अब ऐसे गानों पर डांस करना आम हो गया है। यहां तक कि बुजुर्ग भी ऐसे गानों पर झूमते नजर आते हैं। यह सवाल उठाता है कि क्या यह मात्र एक मनोरंजन का साधन है, या फिर हमारी सांस्कृतिक चेतना पर पड़ रही एक गंभीर चोट?

समाज और प्रशासन की भूमिका

यह समस्या केवल कलाकारों और निर्माताओं तक सीमित नहीं है। इस पूरे परिदृश्य में आयोजक, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और यहां तक कि दर्शक भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। यदि जनता इस प्रकार के कंटेंट को पसंद नहीं करेगी, तो यह अपने आप बंद हो जाएगा।

इसके अलावा, सरकार और प्रशासन को भी इस ओर ध्यान देना होगा। अश्लीलता परोसने वाले गानों और फिल्मों पर सख्ती से अंकुश लगाना जरूरी है। कुछ राज्यों में अश्लील गानों पर प्रतिबंध लगाने की पहल की गई है, लेकिन यह काफी नहीं है।

  • सख्त सेंसरशिप कानून: सोशल मीडिया और यूट्यूब पर अपलोड होने वाले कंटेंट पर सेंसरशिप लागू की जाए और फूहड़ता को बढ़ावा देने वाली सामग्री को प्रतिबंधित किया जाए।
  • प्रोत्साहन और समर्थन: कलाकारों को अश्लीलता से दूर रहकर पारंपरिक लोककला को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
  • जनजागरण: जनता को भी समझना होगा कि जो कुछ भी मनोरंजक लगता है, वह जरूरी नहीं कि समाज के लिए फायदेमंद हो। इस विषय पर जागरूकता अभियान चलाए जाएं।

निष्कर्ष: लोककला को बचाने की जरूरत

संस्कृति किसी भी समाज की आत्मा होती है, और इसे बचाने की जिम्मेदारी हम सभी की है। आधुनिकता के नाम पर लोककला को विकृत करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कलाकारों को चाहिए कि वे अपनी प्रसिद्धि और आर्थिक लाभ के लिए लोकसंस्कृति को अश्लीलता की ओर न मोड़ें।

यदि इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में हमारी सांस्कृतिक पहचान पूरी तरह धूमिल हो सकती है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार, समाज और स्वयं कलाकारों को मिलकर प्रयास करने होंगे, ताकि लोककला अपनी वास्तविक गरिमा के साथ जीवित रह सके।

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