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​जब तक मन का रावण जिंदा है, तब तक हर जश्न अधूरा है: डॉ. प्रियंका सौरभ की खास कविता

पुतले जलाने से क्या होगा? जब तक मन का रावण जिंदा है, तब तक हर जश्न अधूरा है — डॉ. प्रियंका सौरभ की इस कविता ने खोली समाज की आँखें

TargetTvLive | विशेष लेख : अवनीश त्यागी 

हर साल विजयादशमी आती है, आसमान गूंजता है, और रावण का बड़ा सा पुतला धू-धू कर जल जाता है। हम तालियां बजाते हैं, खुशियां मनाते हैं और मान लेते हैं कि बुराई पर अच्छाई की जीत हो गई। लेकिन क्या सच में ऐसा है? क्या पुतले के जलने से हमारे अंदर की बुराइयां भी खत्म हो जाती हैं?

प्रसिद्ध कवयित्री और सामाजिक चिंतक डॉ. प्रियंका सौरभ (पीएचडी, राजनीति विज्ञान) ने अपनी इस बेबाक कविता ‘जलते पुतले, बढ़ते रावण’ के जरिए आज के समाज से यही सबसे बड़ा और कड़वा सवाल पूछा है। उनका यह काव्य पाठ हमारे पाखंड और खोखले होते उत्सवों पर एक करारा तमाचा है।

1. दिखावे का जश्न और भीतर पलते विकार

“पुतला जलकर राख है, मन में भरा विकार। कैसे होगा अंत फिर, झूठ-कपट- अहँकार॥”

डॉ. प्रियंका सौरभ लिखती हैं कि आज के समय में त्योहार सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गए हैं। मैदान में खड़े रावण के पुतले पर तो हम तीरों की बौछार कर देते हैं, लेकिन हमारे खुद के मन में लोभ, मोह, अहंकार और झूठ का जहर भरा पड़ा है। रावण के तो सिर्फ दस सिर थे, लेकिन आज हमारे समाज में हजारों रूपों में वैसे ही शैतान खुलेआम घूम रहे हैं।

2. भगवान की आरती और इंसानियत पर वार

आज के समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक तरफ हम मंदिरों में पूजा-पाठ करते हैं, भगवान के आगे माथा टेकते हैं, और दूसरी तरफ समाज में शर्मनाक कांड होते हैं।

कवयित्री ने बहुत ही तीखे शब्दों में इस पाखंड पर चोट की है:

“नारी की अस्मत लुटे, मानवता लाचार। किस मुँह से उत्सव मने, बोलो करो विचार॥ मंदिर में कर आरती, सँग करें अनाचार। यूँ धर्म-कर्म से भला, कैसे हो उद्धार॥”

जब तक देश में बेटियां सुरक्षित नहीं हैं और मानवता लाचार है, तब तक इस तरह के दिखावटी उत्सव मनाने का कोई हक नहीं बनता।

3. डिग्रियां बड़ी, पर सोच छोटी

आज युवा पढ़-लिखकर बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर रहा है, लेकिन संस्कारों के मामले में हम पीछे छूटते जा रहे हैं। इस बात को बेहद साधारण और असरदार तरीके से रखते हुए लेखिका कहती हैं:

“शिक्षा पाकर भी अगर, मन में रहे विकार। डिग्री केवल कागजों, चरित्र असल आधार॥”

जब तक इंसान अपने भीतर के स्वार्थ और बुराइयों को नहीं छोड़ेगा, तब तक सिर्फ कागजी डिग्रियों का कोई मोल नहीं है। असली ताकत इंसान का अच्छा चरित्र है।

4. असली विजयदशमी क्या है?

डॉ. प्रियंका सौरभ की यह कविता हमें सिर्फ सोचने पर ही नहीं मजबूर करती, बल्कि एक नया रास्ता भी दिखाती है। उनका संदेश बिल्कुल साफ है कि पुतले जलाने से कुछ नहीं बदलेगा, जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगे।

अंत में वे बहुत ही प्रेरणादायक बात कहती हैं:

“राम बनो आचरण से, छोड़ो झूठ-विकार। कर्म तुम्हारे बोल उठें, सच्चा हो त्योहार॥ पुतले जलते रह गए, बदले नहीं विचार। मन का रावण मारिए, तभी जीत साकार॥”

निष्कर्ष (TargetTvLive की कलम से)

डॉ. प्रियंका सौरभ की यह कविता हर उस इंसान के लिए आईना है जो सिर्फ बाहर की सफाई देखता है लेकिन अंदर से मैला है। अगर सच में समाज में बदलाव लाना है, तो रावण के पुतले जलाने से पहले हमें अपने मन के रावण को खत्म करना होगा।

यह विशेष लेख TargetTvLive के डिजिटल पोर्टल पर अवनीश त्यागी द्वारा प्रस्तुत किया गया है। ऐसे ही वैचारिक और समाज को झकझोर देने वाले लेखों के लिए बने रहें हमारे साथ।

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