अशोक सिंघल को सच्ची श्रद्धांजलि उनके आदर्शों को जीवन में उतारना: जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजेश्वराश्रम जी महाराज
बिजनौर में जन्मशताब्दी समारोह में आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता और सत्ता के अहंकार से दूर रहने का संदेश; चंपत राय ने रामजन्मभूमि आंदोलन के साथ संगठन निर्माण में अशोक सिंघल के योगदान को किया याद
बिजनौर | रिपोर्ट: अवनीश त्यागी | Target TV Live
अशोक सिंघल को केवल माल्यार्पण और आरती तक सीमित रखना उनके व्यक्तित्व और विचारों के साथ न्याय नहीं होगा। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि तभी मिलेगी, जब उनके आदर्शों को जीवन में उतारा जाए। यह संदेश बिजनौर के नुमाइश ग्राउंड में आयोजित अशोक सिंघल जन्मशताब्दी समारोह में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम जी महाराज ने दिया। उन्होंने आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता, संगठन के मूल सिद्धांतों और सत्ता के अहंकार से दूर रहने की आवश्यकता पर जोर दिया।
समारोह में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की मौजूदगी रही। विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारी चंपत राय और मुकेश खंडेलकर ने भी अशोक सिंघल के योगदान, उनके त्याग और रामजन्मभूमि आंदोलन से जुड़े विचारों एवं प्रसंगों को साझा किया।
इतिहास लिखना आसान, बनाना कठिन
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम जी महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि इतिहास लिखना आसान है, लेकिन इतिहास बनाने के लिए त्याग, तपस्या और समर्पण की आवश्यकता होती है। अशोक सिंघल ने रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उनके योगदान को केवल औपचारिक आयोजनों और स्मरण तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
उनके संदेश का सार था कि किसी महापुरुष के प्रति सच्चा सम्मान उसके बताए आदर्शों को अपनाने में है। अशोक सिंघल के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दे सकता है।
भौतिक विकास के साथ आध्यात्मिक चेतना भी जरूरी
शंकराचार्य ने भौतिक विकास के साथ आध्यात्मिक चेतना को भी आवश्यक बताया। उनके विचार में केवल संसाधनों और सुविधाओं का विस्तार समाज के संपूर्ण विकास के लिए पर्याप्त नहीं है। संस्कार, आत्मानुशासन और आध्यात्मिक दृष्टि भी जीवन को दिशा देते हैं।
उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन का उल्लेख करते हुए गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र के मार्गदर्शन का उदाहरण दिया। संदेश यह था कि शास्त्रीय ज्ञान के साथ आध्यात्मिक समझ और उचित मार्गदर्शन का भी अपना महत्व है।
सत्ता और पद का अहंकार संगठन के मूल उद्देश्यों से भटका सकता है
विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम जी महाराज ने संगठन की मूल भावना और सत्संग की परंपरा बनाए रखने पर जोर दिया। उन्होंने सत्ता, पद और प्रतिष्ठा के कारण अहंकार से बचने का संदेश दिया।
उनके संबोधन का प्रमुख भाव था कि पद और सत्ता स्थायी नहीं होते। किसी संगठन की वास्तविक मजबूती उसके कार्यकर्ताओं के आचरण, अनुशासन और विचारों के प्रति निष्ठा से आती है।
रामसेतु में गिलहरी का योगदान भी महत्वपूर्ण
शंकराचार्य ने रामसेतु निर्माण से जुड़ी गिलहरी की कथा के माध्यम से समझाया कि किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति में छोटा-सा योगदान भी महत्वपूर्ण होता है। हर व्यक्ति बड़े स्तर पर काम नहीं कर सकता, लेकिन अपनी क्षमता के अनुसार समाज और संगठन के लिए उपयोगी भूमिका निभा सकता है।
अशोक सिंघल के आदर्शों को आगे बढ़ाने का रास्ता भी यही है—अपने सामर्थ्य के अनुसार जिम्मेदारी निभाना और सामाजिक समरसता की भावना को मजबूत करना।
आपातकाल के दौर की स्मृतियां कीं साझा
अपने संबोधन में शंकराचार्य ने आपातकाल के समय की स्मृतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने दिल्ली के आर.के. पुरम में अशोक सिंघल और आचार्य गिरिराज किशोर के साथ बिताए समय को याद किया। उनके वक्तव्य का भाव था कि अशोक सिंघल के सार्वजनिक जीवन और कार्यशैली में आध्यात्मिक अनुशासन तथा वैचारिक प्रतिबद्धता की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
चंपत राय ने रामजन्मभूमि आंदोलन से आगे के योगदान को किया रेखांकित
समारोह में चंपत राय ने अशोक सिंघल के योगदान को केवल रामजन्मभूमि आंदोलन तक सीमित न मानने की बात कही। उन्होंने संगठन निर्माण, सांस्कृतिक जागरण और सामाजिक समरसता से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख किया।
उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन को सामूहिक प्रयासों का परिणाम बताते हुए संतों, कार्यकर्ताओं और समाज की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया। उनके संबोधन में विभिन्न सामाजिक वर्गों को जोड़ने और संगठन के विस्तार से जुड़े अनुभव भी शामिल रहे।
मुकेश खंडेलकर ने त्याग और विचारों के प्रति प्रतिबद्धता पर दिया जोर
मुकेश खंडेलकर ने अपने संबोधन में अशोक सिंघल के त्याग, आध्यात्मिक अनुशासन और विचारों के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने भी इस बात पर जोर दिया कि किसी महापुरुष की विरासत को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल उनका स्मरण करना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को व्यवहार में अपनाना है।
समारोह का संदेश: स्मरण के साथ संकल्प भी जरूरी
बिजनौर के नुमाइश ग्राउंड में आयोजित जन्मशताब्दी समारोह में अशोक सिंघल के विचारों को जीवन और सामाजिक व्यवहार में उतारने का संदेश प्रमुखता से सामने आया। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम जी महाराज ने आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता, अनुशासन और अहंकार से दूर रहने पर जोर दिया।
संदेश स्पष्ट था—महापुरुषों का सम्मान तभी सार्थक होता है, जब उनके विचार समारोहों और भाषणों से आगे बढ़कर समाज के आचरण का हिस्सा बनें।












