35 साल तक दूसरों की आवाज़ बने रहे डॉ. मुस्तकीम… लेकिन उनकी विदाई क्यों बनकर रह गई ‘सिंगल कॉलम’ की खबर?
वरिष्ठ पत्रकार के निधन के महीनों बाद भी कायम हैं कई असहज सवाल, क्या बदलती मीडिया संस्कृति में जमीनी पत्रकारों का सम्मान सिमटता जा रहा है?
विशेष विश्लेषण | TargetTvLive
मुरादाबाद/अमरोहा। कलम की ताकत से समाज की आवाज़ उठाने वाले वरिष्ठ पत्रकार डॉ. मुस्तकीम इस दुनिया को अलविदा कहे कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन उनके निधन से जुड़े कई सवाल आज भी पत्रकारिता जगत और प्रशासनिक व्यवस्था के सामने खड़े हैं। लगभग 35 से 40 वर्षों तक जमीनी पत्रकारिता करने वाले एक मान्यता प्राप्त पत्रकार के निधन पर जिस तरह की चुप्पी दिखाई दी, उसने मीडिया जगत की संवेदनशीलता और व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
यह सवाल केवल डॉ. मुस्तकीम का नहीं है, बल्कि उन हजारों जिला और ग्रामीण पत्रकारों का है, जो पूरी जिंदगी समाज की लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन जब उनकी अंतिम विदाई होती है तो उनकी खबर भी अखबारों में मुश्किल से एक छोटे से कॉलम तक सीमित रह जाती है।
क्या एक पत्रकार की पूरी जिंदगी की कीमत सिर्फ एक कॉलम है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डॉ. मुस्तकीम कोई सामान्य नाम नहीं थे। उन्होंने दशकों तक जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, प्रशासन और जनता के बीच सेतु का काम किया और पत्रकारिता को सिर्फ पेशा नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी माना।
लेकिन उनके निधन के बाद अधिकांश बड़े मीडिया संस्थानों में खबर को बेहद सीमित स्थान मिला। इससे यह बहस फिर तेज हो गई कि क्या अब किसी पत्रकार का सम्मान उसके काम से नहीं, बल्कि उसकी संस्था, पद या प्रभाव से तय होने लगा है?
प्रशासन की संवेदनशीलता पर भी उठे सवाल
पत्रकारों का कहना है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत करने वाले पत्रकारों के निधन पर जिला प्रशासन और सूचना विभाग की ओर से औपचारिक श्रद्धांजलि या शोक संदेश जैसी परंपरा हर जिले में दिखाई नहीं देती। कुछ जिलों में ऐसे उदाहरण जरूर मिलते हैं, लेकिन अधिकांश स्थानों पर यह संवेदनशीलता नज़र नहीं आती।
विडंबना यह भी है कि जिन पत्रकारों ने वर्षों तक सरकारी योजनाओं, जनहित अभियानों और प्रशासनिक सूचनाओं को जनता तक पहुंचाने का काम किया, उन्हीं के अंतिम सफर में व्यवस्था अक्सर खामोश दिखाई देती है।
जीवनभर खबरें लिखीं… लेकिन खुद बड़ी खबर नहीं बन सके
एक पत्रकार हर दिन किसी न किसी की पीड़ा, संघर्ष और उपलब्धि को समाज के सामने लाता है। वह दूसरों की आवाज़ बनता है, लेकिन जब वही पत्रकार इस दुनिया से विदा होता है तो उसकी अपनी खबर अक्सर महत्वहीन मान ली जाती है।
यही वह कड़वी सच्चाई है, जिस पर आज पूरे मीडिया जगत को गंभीरता से सोचने की जरूरत है।
बदलती पत्रकारिता में बढ़ रही है दूरी
पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कॉरपोरेट मॉडल और डिजिटल प्रतिस्पर्धा के बीच खबरों का मूल्यांकन भी बदल रहा है। ऐसे माहौल में जिला और ग्रामीण स्तर पर वर्षों तक ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकार धीरे-धीरे चर्चा के केंद्र से बाहर होते जा रहे हैं।
डॉ. मुस्तकीम का प्रकरण इसी बदलती सोच का आईना माना जा रहा है।
छोटे संस्थानों ने निभाया बड़ा दायित्व
जहां कई बड़े मीडिया संस्थानों ने इस खबर को सीमित महत्व दिया, वहीं अनेक क्षेत्रीय और स्थानीय समाचार संस्थानों ने डॉ. मुस्तकीम के चार दशक लंबे योगदान को प्रमुखता से प्रकाशित किया।
दैनिक सुनहरा तीर टाइम्स, ईशान न्यूज नेटवर्क, बिजनौर टाइम्स, उत्तर केसरी, सियासी तकदीर, उर्दू दैनिक इंकलाब, हिन्दू, रघुवाणी, नेशनल एक्सप्रेस और TargetTvLive जैसे संस्थानों ने उन्हें सम्मानजनक स्थान देकर यह संदेश दिया कि पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि संवेदनाओं और साथियों के सम्मान का भी नाम है।
अब बदलाव की जरूरत
डॉ. मुस्तकीम का निधन एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी पत्रकार बिरादरी के सामने खड़ा एक आईना है। मीडिया संस्थानों, संपादकों, पत्रकार संगठनों और प्रशासनिक तंत्र को यह तय करना होगा कि क्या दशकों तक समाज की सेवा करने वाले पत्रकारों को उनकी अंतिम विदाई पर भी सम्मानजनक स्थान मिलेगा या नहीं।
यदि पत्रकार अपने ही समाज में सम्मान नहीं पाएंगे तो आम समाज से सम्मान की अपेक्षा करना कठिन होगा।
आज आवश्यकता केवल श्रद्धांजलि देने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें हर जमीनी पत्रकार के योगदान को उसके जीवनकाल में भी सम्मान मिले और उसके जाने के बाद भी उसकी सेवाओं को उसी गरिमा से याद किया जाए।
डॉ. मुस्तकीम आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी पत्रकारिता, उनकी सादगी और जनसरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी।
M. P. Singh — विशेष विश्लेषण | TargetTvLive
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