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79 साल बाद मिला हक: बिजनौर के 1,645 परिवार अब अपनी जमीन के मालिक

79 साल बाद मिला हक: बिजनौर के 1,645 परिवार अब अपनी जमीन के मालिक

बिजनौर में इतिहास रचा गया, भूमिधरी अधिकार पत्र मिलते ही बदली हजारों परिवारों की तकदीर

रिपोर्ट: अवनीश त्यागी
स्थान: आलमपुर गावड़ी, बिजनौर
दिनांक: 01 जून 2026

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में आज एक ऐसा ऐतिहासिक अध्याय लिखा गया, जिसका इंतजार हजारों परिवार पिछले कई दशकों से कर रहे थे। अधिकार, पहचान और सम्मान की इस लंबी लड़ाई का सुखद अंत तब हुआ, जब जिले के 1,645 विस्थापित परिवारों को उनकी भूमि का वैधानिक मालिकाना हक प्रदान करते हुए भूमिधरी अधिकार पत्र सौंपे गए।

यह केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि उन परिवारों के संघर्ष, धैर्य और उम्मीदों की जीत है, जो तीन पीढ़ियों से अपनी ही जमीन पर अधिकार पाने के लिए इंतजार कर रहे थे। अब तक जिन खेतों को वे जोतते थे, जिन घरों में रहते थे, उन पर कानूनी रूप से उनका मालिकाना हक नहीं था। आज वह सपना सच हो गया।

विभाजन और विस्थापन की दर्दनाक कहानी

साल 1947 में देश के विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब और सिंध से बड़ी संख्या में हिंदू और सिख परिवार उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में आकर बस गए। इनमें से अनेक परिवार बिजनौर, नजीबाबाद, धामपुर, चांदपुर और नगीना क्षेत्र में स्थापित किए गए।

इसके बाद 1960 से 1975 के बीच पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से आए बंगाली हिंदू शरणार्थियों को बिजनौर जिले के खादर और गंगा तटीय इलाकों में बसाया गया। इनके लिए रवींद्र नगर, दिनेशपुर, सुभाष नगर, गांधीनगर और आनंद नगर जैसी कॉलोनियां विकसित की गईं।

भारत सरकार ने इन परिवारों को आवास के लिए 200 से 250 वर्ग गज भूमि और खेती के लिए लगभग छह-छह एकड़ जमीन उपलब्ध कराई, लेकिन जमीन पर उनका कानूनी स्वामित्व सुनिश्चित नहीं हो सका। यही समस्या आने वाले दशकों में इनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई।

जमीन थी, लेकिन मालिकाना हक नहीं

विस्थापित परिवार वर्षों तक अपनी जमीनों पर खेती करते रहे, लेकिन राजस्व अभिलेखों में उनका नाम दर्ज नहीं था। इसके कारण उन्हें हमेशा बेदखली का डर सताता रहा।

भूमि का स्वामित्व न होने की वजह से ये किसान प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि ऋण, सरकारी अनुदान, खाद-बीज सब्सिडी और अन्य कई सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं ले पा रहे थे। बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए बैंक ऋण लेने में भी उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।

सबसे बड़ी चिंता यह थी कि आने वाली पीढ़ियों को उनकी जमीन का कानूनी अधिकार कैसे मिलेगा।

योगी सरकार की विशेष परियोजना बनी समाधान

दशकों से लंबित इस मानवीय और प्रशासनिक समस्या को उत्तर प्रदेश सरकार ने गंभीरता से लिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर जुलाई 2024 में विस्थापित परिवारों को भूमिधरी अधिकार प्रदान करने के लिए एक विशेष परियोजना शुरू की गई।

परियोजना के तहत राजस्व विभाग और जिला प्रशासन ने व्यापक सर्वेक्षण, अभिलेख सत्यापन और कानूनी प्रक्रियाओं को तेजी से पूरा किया। लंबे समय से लंबित मामलों का निस्तारण कर पात्र परिवारों की सूची तैयार की गई।

करीब दो वर्षों की प्रशासनिक कवायद के बाद आज 1,645 परिवारों को आधिकारिक रूप से भूमिधरी अधिकार पत्र सौंपे गए।

अब बदल जाएगी गांवों की आर्थिक तस्वीर

भूमिधरी अधिकार पत्र मिलने के बाद इन परिवारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। अब राजस्व रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज होगा और वे अपनी भूमि का उत्तराधिकार अपने बच्चों को कानूनी रूप से हस्तांतरित कर सकेंगे।

भूमि के वैध दस्तावेज मिलने से बैंक ऋण प्राप्त करना आसान होगा। किसान कृषि निवेश बढ़ा सकेंगे, आधुनिक खेती अपना सकेंगे और स्वरोजगार के नए अवसर भी विकसित होंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्षेत्र में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और ग्रामीण विकास को नई गति प्राप्त होगी।

सिर्फ जमीन नहीं, पहचान का भी अधिकार

यह फैसला केवल भूमि स्वामित्व तक सीमित नहीं है। यह उन परिवारों की पहचान, सम्मान और सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है, जो वर्षों तक खुद को अधिकारविहीन महसूस करते रहे।

आज मिले अधिकार पत्रों ने न केवल उनकी कानूनी स्थिति मजबूत की है, बल्कि उन्हें यह भरोसा भी दिया है कि अब उनकी अगली पीढ़ियां अनिश्चितता में नहीं जीएंगी।

क्यों है यह फैसला ऐतिहासिक?

  • 1,645 विस्थापित परिवारों को मिला भूमिधरी अधिकार।
  • तीन पीढ़ियों से लंबित भूमि स्वामित्व विवाद का समाधान।
  • राजस्व अभिलेखों में दर्ज होगा वास्तविक मालिक का नाम।
  • किसान सम्मान निधि, केसीसी और बैंक ऋण जैसी सुविधाओं का रास्ता साफ।
  • भूमि का उत्तराधिकार और नामांतरण अब होगा आसान।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि विकास को मिलेगा नया आधार।

बिजनौर में भूमिधरी अधिकार पत्र वितरण केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि न्याय और अधिकार की उस लंबी यात्रा का पड़ाव है, जिसका इंतजार हजारों परिवार दशकों से कर रहे थे। तीन पीढ़ियों का संघर्ष आखिरकार रंग लाया और अब ये परिवार केवल जमीन पर रहने वाले लोग नहीं, बल्कि अपनी जमीन के वैधानिक मालिक बन चुके हैं। यह फैसला आने वाले वर्षों में सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और ग्रामीण विकास का नया अध्याय लिख सकता है।

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