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क्या टूट रहा है बिजनौर का खनन सिंडिकेट? 127 वाहनों पर कार्रवाई के बाद उठे बड़े सवाल

क्या टूट रहा है बिजनौर का खनन सिंडिकेट ? 127 वाहनों पर कार्रवाई के बाद उठे बड़े सवाल

क्या प्रशासन की सख्ती तोड़ पाएगी खनन माफियाओं का नेटवर्क, या फिर कुछ दिन बाद लौट आएगा पुराना खेल?
विशेष विश्लेषण
अवनीश त्यागी | TargetTvLive

बिजनौर। अवैध खनन के खिलाफ बिजनौर प्रशासन द्वारा चलाया गया हालिया अभियान जिले में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है। एक ओर प्रशासन 1526 वाहनों की जांच, 127 वाहनों पर कार्रवाई और 63 लाख रुपये से अधिक की वसूली को बड़ी उपलब्धि मान रहा है, तो दूसरी ओर यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि क्या इतनी कार्रवाई के बाद वास्तव में अवैध खनन का जाल टूट पाएगा या फिर कुछ समय बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा?

खनन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार मई माह में चलाए गए विशेष अभियान के दौरान न केवल अवैध परिवहन और ओवरलोडिंग पर कार्रवाई की गई, बल्कि वर्षों से लंबित मामलों में भी वसूली सुनिश्चित कराई गई। यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि बिजनौर लंबे समय से अवैध खनन और ओवरलोडिंग की शिकायतों को लेकर सुर्खियों में रहा है।

बिजनौर में अवैध खनन: एक पुरानी समस्या, जो बार-बार लौट आती है

जिले के नदी क्षेत्रों और खनन प्रभावित इलाकों में अवैध खनन कोई नई बात नहीं है। समय-समय पर छापेमारी होती है, वाहन पकड़े जाते हैं, जुर्माने लगाए जाते हैं और कुछ दिन तक सख्ती दिखाई देती है। लेकिन फिर धीरे-धीरे हालात पुराने ढर्रे पर लौटने लगते हैं।

यही कारण है कि इस बार की कार्रवाई को केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक प्रभाव से भी देखा जा रहा है। प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कार्रवाई को अभियान नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए।

63 लाख की वसूली सिर्फ आंकड़ा नहीं, बड़ा संदेश है

मई माह की कार्रवाई में 15.76 लाख रुपये की सीधी वसूली, 34.95 लाख रुपये की पुरानी अधिरोपित राशि की वसूली और अवैध भंडारण मामलों में 12.50 लाख रुपये की वसूली की गई।

विश्लेषकों का मानना है कि अवैध खनन के खिलाफ लड़ाई में आर्थिक चोट सबसे प्रभावी हथियार होती है। जब अवैध कारोबार से होने वाला मुनाफा कम होने लगता है, तभी इस नेटवर्क की जड़ें कमजोर पड़ती हैं।

प्रशासन द्वारा पुराने मामलों की वसूली कराना यह संकेत देता है कि अब केवल दिखावटी कार्रवाई नहीं, बल्कि राजस्व की एक-एक पाई वसूलने पर भी जोर दिया जा रहा है।

राजस्व से आगे बढ़कर पर्यावरण और जनहित का मुद्दा

अवैध खनन का असर केवल सरकारी खजाने तक सीमित नहीं है। अनियंत्रित खनन से नदियों का प्राकृतिक स्वरूप बदलता है, भूजल स्तर प्रभावित होता है और आसपास की कृषि भूमि पर भी असर पड़ता है।

वहीं ओवरलोड वाहन सड़कों को समय से पहले जर्जर कर देते हैं। इससे सड़क निर्माण और मरम्मत पर सरकारी खर्च बढ़ता है। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ओवरलोडिंग दुर्घटनाओं की बड़ी वजहों में से एक है।

यानी अवैध खनन केवल नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं, बल्कि पर्यावरण, जनसुरक्षा और सरकारी संसाधनों से जुड़ा गंभीर विषय है।

क्या अब तकनीक और निगरानी से बदलेगी तस्वीर?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल छापेमारी और वाहन चेकिंग से स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए खनन स्थलों की नियमित निगरानी, जीपीएस आधारित ट्रैकिंग, ड्रोन सर्विलांस और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।

यदि खनन स्थलों से लेकर परिवहन मार्गों तक डिजिटल निगरानी का मजबूत तंत्र विकसित किया जाता है, तो अवैध गतिविधियों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।

TargetTvLive विश्लेषण

बिजनौर प्रशासन की हालिया कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि इच्छाशक्ति हो तो अवैध खनन के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाया जा सकता है। 1526 वाहनों की जांच और 63 लाख रुपये से अधिक की वसूली कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। लेकिन इस अभियान की असली सफलता तब मानी जाएगी, जब यह सख्ती आने वाले महीनों में भी उसी तीव्रता के साथ जारी रहे।

फिलहाल प्रशासन ने खनन माफियाओं को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि नियमों की अनदेखी अब महंगी पड़ सकती है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि यह कार्रवाई अस्थायी अभियान साबित होती है या बिजनौर में अवैध खनन के खिलाफ स्थायी बदलाव की शुरुआत बनती है।

लेखक: अवनीश त्यागी
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