कलम के सिपाही क्यों हार रहे जिंदगी की जंग?
वरिष्ठ पत्रकार की आत्महत्या ने खोल दी हिंदी मीडिया की बेरहम सच्चाई, बड़े अखबारों की कार्यशैली पर उठे तीखे सवाल
अमरोहा | TargetTvLive | एम पी सिंह
लोकतंत्र की आवाज़ कहे जाने वाले पत्रकार आज खुद सबसे ज्यादा बेआवाज़ और बेबस होते जा रहे हैं। मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार राजेश अवस्थी की अवसाद के चलते हुई आत्महत्या ने हिंदी पट्टी की पत्रकारिता के उस काले सच को सामने ला दिया है, जिसे वर्षों से दबाने की कोशिश होती रही। यह सिर्फ एक पत्रकार की मौत नहीं, बल्कि टूटते मनोबल, आर्थिक तंगी और मीडिया संस्थानों की संवेदनहीनता की दर्दनाक कहानी है।
वर्षों तक अखबारों के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले पत्रकार आखिर क्यों अकेले पड़ते जा रहे हैं? क्यों जिंदगी भर खबरें लिखने वाला इंसान अपनी ही पीड़ा किसी से नहीं कह पाता? राजेश अवस्थी की मौत अब पूरे मीडिया जगत से यही सवाल पूछ रही है।
खबरें लिखने वालों की खबर लेने वाला कोई नहीं
हिंदी पट्टी के बड़े अखबारों पर आरोप लग रहे हैं कि वे अपने पत्रकारों का इस्तेमाल तो पूरी ताकत से करते हैं, लेकिन मुश्किल वक्त में उन्हें लगभग भूल जाते हैं। जिन लोगों ने वर्षों तक संस्थानों को पहचान दिलाई, उनकी मौत की खबर तक औपचारिकता बनकर रह जाती है। कहीं “अवसादग्रस्त व्यक्ति” तो कहीं “स्थानीय निवासी” लिखकर खबर खत्म कर दी जाती है, ताकि संस्थान की जिम्मेदारी पर सवाल न उठें।
लेकिन दूसरी तरफ, अगर मामला प्रबंधन से जुड़े किसी रसूखदार व्यक्ति का हो तो शब्दों की बारिश शुरू हो जाती है। बड़े-बड़े विशेषण, लंबी श्रद्धांजलियां और भावुक लेख छापे जाते हैं। यही दोहरा चेहरा अब लोगों को चुभने लगा है।
ईमानदार पत्रकार सबसे ज्यादा परेशान
मीडिया जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि आज पत्रकारिता में वही लोग ज्यादा टिक पा रहे हैं जो सत्ता, सेटिंग और तिकड़म के खेल में फिट बैठते हैं। जो पत्रकार ईमानदारी से सिर्फ खबर करना चाहता है, उसके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है।
स्थिति सबसे ज्यादा उन वरिष्ठ पत्रकारों की खराब है, जिनकी उम्र 45 से 50 साल पार हो चुकी है। पूरी जिंदगी पत्रकारिता में गुजार देने के बाद उनके पास दूसरा हुनर नहीं बचता। ऐसे में नौकरी छूटना या आर्थिक संकट आना सीधे परिवार पर भारी पड़ता है। यही वजह है कि कई पत्रकार अंदर ही अंदर मानसिक तनाव और अवसाद से टूट रहे हैं।
बाजारवाद ने छीन ली पत्रकारिता की आत्मा
एक समय था जब पत्रकारिता मिशन मानी जाती थी, लेकिन अब यह पूरी तरह बाजार और मुनाफे के दबाव में दिखाई देने लगी है। बड़े संस्थानों के लिए अब इंसान नहीं, सिर्फ उपयोगिता मायने रखती है। जब तक पत्रकार संस्थान के लिए फायदेमंद है, तब तक उसका महत्व है। जैसे ही वह कमजोर पड़ता है, सिस्टम उसे किनारे कर देता है।
राजेश अवस्थी के सुसाइड नोट में परिवार के लिए कुछ न कर पाने की पीड़ा बताई जा रही है। यह दर्द केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हजारों उन पत्रकारों का है जो रोज संघर्ष कर रहे हैं लेकिन उनकी आवाज कहीं सुनाई नहीं देती।
पत्रकारों की जिंदगी पर बड़ा सवाल
आज फील्ड में काम करने वाले पत्रकारों के पास न नौकरी की सुरक्षा है, न पर्याप्त वेतन, न स्वास्थ्य सुविधा और न मानसिक सहयोग। डिजिटल दौर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने दबाव और बढ़ा दिया है। छोटे शहरों और जिलों में काम करने वाले पत्रकार सबसे ज्यादा संकट में हैं।
राजेश अवस्थी की मौत ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है —
क्या सच लिखने वाले पत्रकारों का अंत अब गुमनामी, तनाव और अभावों में ही होगा?
“ज़मीन सुनती नहीं है तो आसमां से कहो,
जवाब कोई तो देगा सवाल करते रहो…”
— शकील आज़मी
यह घटना केवल शोक का विषय नहीं, बल्कि पूरे मीडिया जगत के लिए चेतावनी है। अगर कलम के सिपाहियों की जिंदगी सुरक्षित नहीं होगी, तो लोकतंत्र की आवाज भी कमजोर पड़ जाएगी।
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