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कटते पेड़, सूखते तालाब और बिकता पानी… कविता में दिखी भविष्य की डरावनी तस्वीर

“जब तालाब सूखेंगे तो जिंदगी भी प्यासे हो जाएगी…” डॉ. सत्यवान सौरभ की कविता ने झकझोर दिया देश

बोतलबंद पानी, कटते पेड़ और खत्म होते तालाबों पर बड़ा सवाल, कविता बनी जल संकट की चेतावनी

अवनीश त्यागी | TargetTvLive

देश में बढ़ते जल संकट, सूखती नदियों और खत्म होते तालाबों के बीच डॉ. सत्यवान सौरभ की कविता “बूंद-बूंद में बस रहा, धरती का संसार” लोगों के दिलों को छू रही है। यह कविता सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आने वाले खतरे की चेतावनी है। सरल भाषा में लिखी गई यह रचना आज के समाज, सरकार और आम इंसान— तीनों से बड़े सवाल पूछती है।

कविता बताती है कि अगर पानी खत्म हुआ तो सिर्फ तालाब नहीं सूखेंगे, बल्कि इंसान की जिंदगी भी संकट में पड़ जाएगी।

“पानी अब जरूरत नहीं, कारोबार बन गया”

कविता की ये पंक्तियाँ आज की सबसे बड़ी सच्चाई बयान करती हैं—

“बोतल वाले बेचते, पानी का व्यापार,
सूखी नदियाँ पूछतीं, कहाँ गए संस्कार।”

आज शहरों में पानी बोतलों में बिक रहा है, जबकि गाँवों के कुएँ, तालाब और नदियाँ सूखती जा रही हैं। पहले लोग पानी बचाने की सोचते थे, अब उससे पैसा कमाने की होड़ लगी है। कविता इसी बदलती सोच पर चोट करती है।

कटते पेड़, बढ़ती गर्मी और फिर बारिश को दोष

डॉ. सत्यवान सौरभ ने आधुनिक शहरों की सोच पर भी करारा तंज कसा है।

“एसी वाले शहर ने, काट दिए सब पेड़,
फिर बादल को कोसते, सूख गए जब मेड़।”

शहरों में बड़े-बड़े भवन और एसी तो बढ़ गए, लेकिन पेड़ लगातार कटते गए। नतीजा— गर्मी बढ़ी, बारिश कम हुई और खेत सूखने लगे। कविता बताती है कि इंसान खुद प्रकृति को नुकसान पहुँचा रहा है और फिर उसी प्रकृति को दोष देता है।

तालाब खत्म हुए तो संस्कृति भी खत्म हो गई

एक समय था जब गाँवों की पहचान तालाब, बावड़ी और जोहड़ हुआ करते थे। लोग मिलकर पानी बचाते थे। लेकिन अब ये परंपराएँ गायब होती जा रही हैं।

“जोहड़-बावड़ियाँ गई, नई पढ़ाई भूल…”

कविता साफ कहती है कि आधुनिकता की दौड़ में नई पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है। पुराने जल स्रोत मिट रहे हैं और उनकी जगह कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं।

तालाबों पर कब्जा, भविष्य पर खतरा

कविता की सबसे दर्द भरी पंक्तियाँ वो हैं, जहाँ तालाबों पर हो रहे निर्माण का जिक्र आता है—

“तालाबों पर हो रहे, महलों के निर्माण,
माटी रोती देखती, डूब रहा इंसान।”

आज कई शहरों और कस्बों में तालाबों को पाटकर कॉलोनियाँ और इमारतें बनाई जा रही हैं। इसका असर अब साफ दिखने लगा है— कहीं पानी की भारी कमी है तो कहीं हल्की बारिश में ही जलभराव हो जाता है।

“आज पानी बचाओ, तभी कल परिवार बचेगा”

कविता आखिर में समाज को एक बड़ा संदेश देती है—

“आज बचाओ बूँद को, कल बचे परिवार…”

यह सिर्फ कविता की लाइन नहीं, बल्कि आने वाले समय की सच्चाई है। अगर अभी से पानी बचाने, तालाबों को पुनर्जीवित करने और पेड़ लगाने पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को भारी संकट झेलना पड़ सकता है।

TargetTvLive विश्लेषण

डॉ. सत्यवान सौरभ की यह कविता सीधे आम लोगों के दिल तक पहुँचती है। कठिन शब्दों के बिना, बेहद सरल भाषा में उन्होंने जल संकट, पर्यावरण विनाश और इंसानी स्वार्थ की पूरी तस्वीर सामने रख दी है। यही वजह है कि यह कविता सोशल मीडिया से लेकर जनचर्चाओं तक तेजी से लोगों का ध्यान खींच रही है।

यह रचना बताती है कि पानी सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।

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