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“घूसखोर पंडत” फिल्म पर बवाल: यूपी में FIR तय, मायावती ने की कड़ी निंदा

“घूसखोर पंडत” फिल्म पर बवाल: यूपी में FIR तय, मायावती ने की कड़ी निंदा, क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम सामाजिक सौहार्द की जंग छिड़ी?

नेटफ्लिक्स पर प्रस्तावित फिल्म “घूसखोर पंडत” को लेकर देश, खासकर उत्तर प्रदेश में सियासी और सामाजिक घमासान तेज हो गया है। फिल्म के शीर्षक (टाइटल) को लेकर उठे सवाल अब केवल सोशल मीडिया बहस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मामला कानूनी कार्रवाई, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और सामाजिक संगठनों के विरोध तक पहुंच चुका है। इस विवाद ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि रचनात्मक स्वतंत्रता की सीमा कहां खत्म होती है और सामाजिक जिम्मेदारी कहां से शुरू होती है।

विवाद की जड़: नाम से नाराज़गी, भावनाओं पर चोट का आरोप

फिल्म के नाम में प्रयुक्त शब्द “घूसखोर” को “पंडत/पंडित” जैसे शब्द के साथ जोड़ने पर कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह शीर्षक ब्राह्मण समुदाय को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता है और इससे समाज में गलत संदेश जाता है।
आरोप है कि इस तरह के शब्द प्रयोग से जातिगत पूर्वाग्रह को बढ़ावा मिलता है और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंच सकता है।

सोशल मीडिया पर #BoycottGhooskhorPandat जैसे ट्रेंड चलने लगे, जिसके बाद मामला तेजी से राजनीतिक गलियारों तक पहुंच गया।

उत्तर प्रदेश में FIR की तैयारी, कानून के दायरे में आई फिल्म

विवाद बढ़ने के बाद उत्तर प्रदेश में फिल्म से जुड़े लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी सामने आई है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि फिल्म का शीर्षक

  • धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है
  • जाति विशेष को बदनाम करता है
  • सामाजिक शांति भंग करने की आशंका पैदा करता है

इन्हीं आधारों पर आईपीसी और आईटी एक्ट की प्रासंगिक धाराओं के तहत कार्रवाई की बात कही जा रही है। प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था और सामाजिक संतुलन बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता है।

मायावती की सख्त प्रतिक्रिया: “यह समाज को बांटने की कोशिश”

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने फिल्म के नाम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे

“एक वर्ग विशेष की छवि को जानबूझकर धूमिल करने वाला और समाज में नफरत फैलाने वाला प्रयास”
करार दिया।

मायावती ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की कि ऐसी फिल्मों पर सख्त कार्रवाई हो और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को भी जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। उनके अनुसार,

“रचनात्मकता के नाम पर किसी भी समाज या वर्ग की भावनाओं से खिलवाड़ स्वीकार्य नहीं है।”

फिल्म निर्माताओं का पक्ष: ‘किसी समुदाय को निशाना नहीं’

विवाद के बीच फिल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि

  • फिल्म किसी जाति या समुदाय के खिलाफ नहीं है
  • ‘पंडत’ शब्द का प्रयोग एक काल्पनिक पात्र के संदर्भ में किया गया है
  • कहानी का उद्देश्य भ्रष्टाचार पर व्यंग्य करना है, न कि किसी वर्ग का अपमान

निर्माताओं का दावा है कि फिल्म को पूरे संदर्भ में देखे बिना निष्कर्ष निकालना गलत होगा।

सिनेमा, समाज और सियासत का टकराव

यह विवाद केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बड़े सवाल खड़े करता है—
✔️ क्या कला और सिनेमा को पूरी आज़ादी होनी चाहिए?
✔️ या फिर सामाजिक संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए?
✔️ क्या नाम और प्रतीकों का चुनाव भी उतना ही जिम्मेदार होना चाहिए जितनी कहानी?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में शब्दों की ताकत बहुत बड़ी होती है। गलत संदर्भ में इस्तेमाल किया गया एक शब्द भी बड़े सामाजिक तनाव को जन्म दे सकता है।

आगे क्या?

अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि—

  • क्या फिल्म के नाम में बदलाव किया जाएगा?
  • क्या कानूनी कार्रवाई फिल्म की रिलीज़ को प्रभावित करेगी?
  • और क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिए नई गाइडलाइंस तय होंगी?

स्पष्ट है कि “घूसखोर पंडत” विवाद आने वाले समय में सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी पर नई बहस को जन्म देगा।

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