जहरीला पानी, सूखते जलस्रोत और बीमार गांव: 45 दिन से धरने पर किसान, प्रशासन अब भी राजनीतिक शोर में मशगूल

📍 अमरोहा | 03 फरवरी 2026
एक तरफ जहरीला सतही पानी, सूखते तालाब-जोहड़, बर्बाद फसलें और अस्पतालों में कराहते ग्रामीण—दूसरी तरफ प्रशासन की प्राथमिकताएं राजनीतिक शोर और तात्कालिक फायदे तक सीमित। अमरोहा के गजरौला क्षेत्र का नाईपुरा गांव आज ‘जल-त्रासदी’ की जीती-जागती तस्वीर बन चुका है, लेकिन जिला प्रशासन की चुप्पी इस संकट को और भयावह बना रही है।
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले शहबाजपुर डोर में जहरीले पानी के खिलाफ बेमियादी धरना 45वें दिन में प्रवेश कर चुका है। इसके बावजूद न तो कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही प्रशासन की ओर से सार्थक संवाद का कोई संकेत मिला है।
“चिंता जताने में अव्वल, समाधान में नाकाम प्रशासन”
किसान नेताओं ने प्रशासन की निष्क्रियता पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अधिकारियों का सबसे बड़ा “योगदान” हर साल गहरी चिंता जताने तक सीमित रह गया है।
भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी ने कहा,
“नाईपुरा जैसी जल-आपदा पर आंखें मूंद लेना आत्ममुग्धता नहीं तो और क्या है? यहां पानी ही नहीं, लोगों का भविष्य भी जहरीला किया जा रहा है।”
उन्होंने बताया कि जंगल और पारिस्थितिकी देश की जीडीपी में लगभग 7% योगदान देती है, जबकि सबसे गरीब तबके की 57% आय इसी पर निर्भर है। इसके बावजूद अंधाधुंध प्रदूषण से जैवविविधता को खत्म किया जा रहा है।
मिट्टी और पानी में घुला जहर नदियों, तालाबों और जोहड़ों को निगल रहा है—फसलें चौपट हैं, मवेशी मर रहे हैं और गांव बीमारी का स्थायी ठिकाना बनता जा रहा है।
वैज्ञानिक चेतावनी: जल चक्र टूटने की कगार पर
प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान ने गंभीर वैज्ञानिक चेतावनियों का हवाला देते हुए कहा कि
ताजे पानी से जुड़े 9 प्राकृतिक चक्रों में से 6 अस्थिर हो चुके हैं। इसका सीधा असर भीषण गर्मी, पानी की भारी कमी और संक्रमण के बढ़ते खतरे के रूप में सामने आ रहा है।
उन्होंने बताया कि देश में हर साल 15 लाख बच्चों की मौत जलजनित बीमारियों से होती है, जबकि नाईपुरा में हालात और भी भयावह हैं।
यहां कुपोषण, बच्चों के कद में गिरावट और जलजनित रोगों का स्तर राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है।
चिकित्सकों के अनुसार दूषित सतही पानी और सूखते स्रोतों ने अस्पतालों को मरीजों से भर दिया है, लेकिन प्रशासन अब भी राजनीतिक प्राथमिकताओं में उलझा है।
“स्वच्छ जल पाइप से नहीं, स्वस्थ पारिस्थितिकी से आता है”
अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी एहसान अली ने प्रशासन से सीधा सवाल किया—
“क्या मुनाफे की राजनीति में सबसे कमजोर वर्गों की जान की कोई कीमत नहीं?”
उन्होंने कहा कि प्रशासन गैर-मानव जीवमंडल को पूरी तरह भुला चुका है, जबकि सच्चाई यह है कि स्वच्छ जल केवल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट से नहीं, बल्कि जीवित और स्वस्थ पारिस्थितिकी से मिलता है—और वही आज जहर के दबाव में दम तोड़ रही है।
किसानों का साफ अल्टीमेटम
किसान नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर यह त्रासदी यूं ही बढ़ती रही, तो विकास के सारे दावे खोखले साबित होंगे।
धरने पर बैठे किसानों की प्रमुख मांगें हैं—
- प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों पर सख्त कार्रवाई
- प्रभावी और पारदर्शी प्रदूषण नियंत्रण
- ग्रामीणों को स्वच्छ, सुरक्षित और स्थायी पेयजल की गारंटी
धरने में महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के साथ सोमपाल सिंह, सुरेश चंद्र, ओम प्रकाश सिंह, होमपाल सिंह, समर पाल सिंह, राम प्रसाद सिंह, सिसपाल सिंह, जगन सैनी, रामपाल सैनी, राम चरण सिंह, जसवंत सैनी, विजय सिंह सहित बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।
निष्कर्ष
नाईपुरा सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि उस विकास नीति पर बड़ा सवाल है जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की कीमत पर आगे बढ़ाई जा रही है।
प्रशासन की खामोशी किसानों के धैर्य की आखिरी परीक्षा ले रही है—अब देखना यह है कि समाधान पहले आता है या हालात और बिगड़ते हैं।
❓ FAQ | Fact-Check: नाईपुरा जल संकट
❓ नाईपुरा गांव में जल संकट की असली समस्या क्या है?
✔️ तथ्य:
नाईपुरा गांव में दूषित सतही पानी, औद्योगिक अपशिष्ट और सूखते प्राकृतिक जलस्रोतों के कारण गंभीर जल संकट पैदा हो गया है। तालाब, जोहड़ और नदियां या तो सूख चुकी हैं या जहरीली हो चुकी हैं, जिससे पीने और सिंचाई—दोनों के लिए पानी अनुपयोगी बन गया है।
❓ क्या यह सिर्फ किसानों का आरोप है या इसके वैज्ञानिक आधार भी हैं?
✔️ फैक्ट-चेक:
यह सिर्फ आरोप नहीं है। वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार ताजे पानी से जुड़े 9 में से 6 जल चक्र अस्थिर हो चुके हैं। इसका सीधा असर भूजल स्तर, सतही जल और स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। यह वैश्विक पर्यावरण अध्ययनों और सार्वजनिक स्वास्थ्य आंकड़ों से भी मेल खाता है।
❓ क्या दूषित पानी से बीमारियां वास्तव में बढ़ रही हैं?
✔️ पुष्टि:
चिकित्सकों के अनुसार दूषित सतही पानी और जलस्रोतों के सूखने से
- डायरिया
- त्वचा रोग
- पेट और लीवर संबंधी बीमारियां
- बच्चों में कुपोषण और कद में गिरावट
जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
❓ भारत में जलजनित बीमारियों की स्थिति कितनी गंभीर है?
✔️ तथ्य:
देशभर में हर साल लगभग 15 लाख बच्चों की मौत जलजनित बीमारियों से होती है। नाईपुरा जैसे गांव इस राष्ट्रीय संकट की जमीनी तस्वीर पेश कर रहे हैं, जहां हालात औसत से कहीं अधिक खराब बताए जा रहे हैं।
❓ क्या जंगल और पारिस्थितिकी का इस संकट से सीधा संबंध है?
✔️ फैक्ट-चेक:
हाँ। जंगल और पारिस्थितिकी देश की GDP में लगभग 7% योगदान देते हैं, जबकि ग्रामीण और गरीब आबादी की 57% आय इन्हीं संसाधनों पर निर्भर है। जैवविविधता के नष्ट होने से जल पुनर्भरण (Water Recharge) रुकता है, जिससे सूखा और प्रदूषण दोनों बढ़ते हैं।
❓ क्या स्वच्छ जल केवल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट से संभव है?
❌ भ्रामक दावा — सुधार जरूरी
✔️ तथ्य:
विशेषज्ञों के अनुसार स्वच्छ जल सिर्फ पाइपलाइन या ट्रीटमेंट प्लांट से नहीं आता, बल्कि स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र से आता है। जब मिट्टी, जंगल और जलस्रोत जहरीले होंगे, तो तकनीकी समाधान भी अस्थायी साबित होंगे।
❓ धरना कब से चल रहा है और किसके नेतृत्व में?
✔️ पुष्टि:
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) संयुक्त मोर्चा के बैनर तले यह बेमियादी धरना 45 दिनों से चल रहा है। इसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश चौधरी, प्रदेशाध्यक्ष रामकृष्ण चौहान सहित कई किसान नेता सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
❓ किसानों की प्रमुख मांगें क्या हैं?
✔️ तथ्य:
- प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों पर सख्त कार्रवाई
- प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था
- ग्रामीणों को स्वच्छ, सुरक्षित और स्थायी पेयजल की गारंटी
- स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रभावों की स्वतंत्र जांच
❓ प्रशासन की ओर से अब तक क्या कार्रवाई हुई है?
❌ फैक्ट-चेक:
अब तक कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई या औपचारिक संवाद सामने नहीं आया है। प्रशासनिक चुप्पी को किसान संगठनों ने गंभीर लापरवाही करार दिया है।
❓ अगर स्थिति नहीं सुधरी तो आगे क्या खतरे हो सकते हैं?
✔️ चेतावनी:
- स्थायी जल संकट
- कृषि उत्पादन में भारी गिरावट
- ग्रामीण पलायन
- स्वास्थ्य आपातकाल
- विकास दावों की विश्वसनीयता पर सवाल
Fact-Check निष्कर्ष
नाईपुरा का जल संकट किसी अफवाह या राजनीतिक बयानबाजी का परिणाम नहीं, बल्कि पर्यावरणीय उपेक्षा, औद्योगिक प्रदूषण और प्रशासनिक निष्क्रियता से उपजी वास्तविक त्रासदी है। उपलब्ध तथ्य किसानों के दावों की पुष्टि करते हैं और तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हैं।
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